शनिवार, 30 दिसंबर 2017

(मीनाक्षी वर्मा ) : 
 संयोग देखिए कि जिंदगी का पहला उपन्यास पढ़ा भी तो अपनी बोली हरियाणवी का 'जाट कहवै, सुण जाटणी' । इस दौरान यूं लगता रहा जैसे उपन्यास नहीं पढ़ रही बल्कि कोई फ़िल्म आंखों के सामने चल रही हो। कमाल का सजीव चित्रण किया प्रदीप नील वशिष्ठ जी आपने । 
चार पीढ़ियों में फैली इस कहानी में कोई भी विषय नहीं छोड़ा लेखक ने । उपन्यास की खासियत यह कि सीधी सपाट कहानी नहीं है । इस उपन्यास की कई गलियां हैं और हर गली हमें अपने समाज की तरफ लेकर चलती है । रास्ते में कहीं व्यभिचार या कुरीतियों का घुटनों तक कीचड़ है तो कहीं नारी सौंदर्य के सुंदर फूल खिले हैं ।
हास्य रस तो कमाल का है ही, अपनी बोली के शब्दों का चयन भी बेजोड़ है । कहीं कहीं हंसते हंसते पेट दुखने लगता है ,वहीं प्रमोद वसुधा की प्रेम कहानी आंसू भी छलका देती है । प्रमोद का अंत तो मार्मिक है ही, उसके बुत के साथ जो दुर्व्यवहार होता है वह इसी निर्मम समाज की झलक है ।
उपन्यास की दो विशेषताएं और भी उल्लेखनीय हैं । एक तो यह कि पाठक में बढ़िया काव्य की समझ पैदा होती है और दूसरा धोती का चरित्र बताता है कि प्रेम सिर्फ देह से नहीं बल्कि आत्मा से जुड़ा होता है । सिर्फ सुंदर ही नहीं बल्कि बेडौल लोगों में भी प्रेम की वही भावनाएं होती हैं ।
उपन्यास में उपमाएं बहुत हैं मगर कहीं कहीं इतनी ज्यादा कि कहानी के प्रवाह में बाधा पड़ती है। लेकिन मैंने इस उपन्यास को मन लगाकर पढ़ा , सहज सहज । खत्म हो गया तो लगा काश अभी खत्म न होता। समय निकाल कर इसे फिर पढूंगी , बार- बार पढूंगी । अब तो मैं और उपन्यास भी पढ़ा करुँगी। इस उपन्यास की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी कि इसने मुझमें उपन्यास पढने की रूचि जगाई । आपको हार्दिक बधाई प्रदीप जी और अगले उपन्यास की शुभकामनाएँ
( हरियाणा की लता मंगेशकर के रूप में विख्यात बहुमुखी प्रतिभा की धनी मीनाक्षी पांचाल ने तेरह वर्ष की उम्र से गाना शुरू किया था . उसके बाद तो हिंदी हो या हरियाणवी , फ़िल्में , एल्बम हों या जिंगल मीनाक्षी जी की आवाज अपना जादू बिखेरती रही .भ्रूण हत्या पर ' मात मन्नै मरवाइए मत ना ' गीत से विशेष ख्याति पाने वाली मीनाक्षी जी टोहाना के वरिष्ठ संगीतकार Makk vee से शादी के बाद मीनाक्षी वर्मा के नाम से जानी जाती हैं . टीवी पर कभी हरियाणवी रामायण देखने का मौका मिले तो सीता की आवाज़ सुनेंगे तो पहचान जाएँगे कि यह आवाज़ तो मीनाक्षी की है . )

रविवार, 10 दिसंबर 2017

बबीता कन्यान


'जाट कहवै, सुण जाटणी' पहला हरियाणवी उपन्यास है जो मैंने पढ़ा । यह मुझे बहुत ही पसन्द आया । इसमें दूबे जी और पुजारी जी का जो रोल है, वह आज की कड़वी सच्चाई है । ये लोग भोली भाली जनता का कितना फायदा उठाते हैं , उपन्यास में इसका बहुत बढिया चित्रण है ।
यह उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह हंसी भी बहुत आई । खास कर ,धोती प्रसाद की स्कूल में दी गई स्पीच ने खूब हंसाया । उसकी बेकार और निरर्थक कविताओं ने भी दिमाग खराब किया। उपन्यास ने सही दिखाया कि ऐसे नकली भी कवि होते हैं आजकल । दूसरी तरफ दूबे जी जैसे भ्रष्ट लोग आज भी भोली जनता का फायदा उठा रहे हैं.और बेचारे प्रमोद जैसे भोले लोग उनके षड्यंत्र में पता नही कहाँ गुम हो जाते हैं.. उपन्यास ने उदास भी बहुत किया प्रमोद के मरने पर। वह कम से कम शिशिर के लिए ब्यान दे जाता तो तस्वीर ही बदल जाती। मुझे वसुधा पर भी बहुत दया आई। उसका प्रेम सच्चा था प्रमोद के लिए... पर बेचारी गरीब विधवा को दुनिया से डर भी था.
सच कहूँ तो मुझे ये उपन्यास बहुत ही अच्छा लगा...मैं तो कहती हूँ आप सब भी इस हरियाणवी उपन्यास को एक बार जरूर पढ़े..क्योंकि इसमें समाज का सच्चा रूप दिखाया गया है और वो भी अपनी हरियाणवी भाषा में।
प्रदीप जी , आपने बहुत अच्छा प्रयास किया है.. उम्मीद है कि आप आगे भी जारी रखेंगे. हरियाणवी भाषा को ऎसे ही आगे ले जाते रहे
धन्यवाद..
( बबीता कन्यान करनाल के शामगढ़ से हैं और व्यवसाय से इंजीनियर हैं। )

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

मीनाक्षी चौधरी : किताबें पढ़ने का शौक तो माँ से विरासत में मिला मुझे । हिंदी, अंग्रेजी की असंख्य किताबें तो पढ़ी ही, अनुवाद की जगह मूल साहित्य पढ़ने के लिए पंजाबी भी सीखी मैंने । हरियाणवी कहानियां तो माँ की खूब पढ़ी ही थी । ऐसे में इस हरियाणवी उपन्यास की चर्चा सुनी तो इसे पढ़ने की उत्सुकता चरम पर पहुंच गई ।
जैसा नाम सुना था, वैसे यह उपन्यास है भी । सच कहूं तो मैंने इसके पात्रों को अपने आसपास जीवित होते देखा । कहानी सुनाती अपनी ही नानी दिखी, धोती प्रसाद से पड़ौस के काका और दूबे जैसा ही काइयां गाँव का दुकानदार । तब लगा उपन्यास का मेदनीपुर मेरा गांव है और देश का हर गाँव मेदनीपुर ।
कभी हंसाते-गुदगुदाते और कभी रुलाते पात्रों से हम इतना जुड़ जाते हैं कि कहानी प्रदीप जी की न रह कर हमारी अपनी सी हो जाती है ।
घोर अँधेरे में आशा की किरण बन कर आए प्रमोद से मिल कर लगता है ,अभी मेदनीपुर की सूरत बदल जाएगी । लेकिन वह शातिर दूबे की घिनौनी चाल का शिकार बन जाता है तो दिल बहुत उदास हो जाता है । उसकी और वसुधा की निश्छल सी प्रेम कहानी का अंत देख भी मन धुआं धुआं होने लगता है ।
लेकिन यह बॉलीवुड की कहानी तो है नहीं कि कोई चमत्कार हो और हैप्पी एंडिंग हो जाए। महाभारत काल के शकुनि के पांसे जब तक दूबे जैसे नेताओं के हाथ हैं, प्रमोद यूं ही हारते रहेंगे । उपन्यास के इसी वास्तविक चित्रण ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया । अन्याय, शोषण और षड्यंत्र का अंतहीन सिलसिला जब तक चलेगा, कहानी भी निरन्तर चलेगी ।
बधाई और शुभ कामनाएं प्रदीप जी ।
( दिल्ली पब्लिक स्कूल बठिंडा में जीव विज्ञान पढ़ाने वाली मीनाक्षी चौधरी प्रबुद्ध पाठक हैं । आप कुरुक्षेत्र निवासी हरियाणवी की सुप्रसिद्ध रचनाकार श्रीमती कमलेश चौधरी की बेटी हैं । साहित्य की जन्म घुट्टी बचपन से ही मिली , इसलिए आपका मन साहित्य में ही रमता है ।)
'जाट कहवै, सुण जाटणी' पहला हरियाणवी उपन्यास है जो मैंने पढ़ा । यह मुझे बहुत ही पसन्द आया । इसमें दूबे जी और पुजारी जी का जो रोल है, वह आज की कड़वी सच्चाई है । ये लोग भोली भाली जनता का कितना फायदा उठाते हैं , उपन्यास में इसका बहुत बढिया चित्रण है ।
यह उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह हंसी भी बहुत आई । खास कर ,धोती प्रसाद की स्कूल में दी गई स्पीच ने खूब हंसाया । उसकी बेकार और निरर्थक कविताओं ने भी दिमाग खराब किया। उपन्यास ने सही दिखाया कि ऐसे नकली भी कवि होते हैं आजकल । दूसरी तरफ दूबे जी जैसे भ्रष्ट लोग आज भी भोली जनता का फायदा उठा रहे हैं.और बेचारे प्रमोद जैसे भोले लोग उनके षड्यंत्र में पता नही कहाँ गुम हो जाते हैं.. उपन्यास ने उदास भी बहुत किया प्रमोद के मरने पर। वह कम से कम शिशिर के लिए ब्यान दे जाता तो तस्वीर ही बदल जाती। मुझे वसुधा पर भी बहुत दया आई। उसका प्रेम सच्चा था प्रमोद के लिए... पर बेचारी गरीब विधवा को दुनिया से डर भी था.
सच कहूँ तो मुझे ये उपन्यास बहुत ही अच्छा लगा...मैं तो कहती हूँ आप सब भी इस हरियाणवी उपन्यास को एक बार जरूर पढ़े..क्योंकि इसमें समाज का सच्चा रूप दिखाया गया है और वो भी अपनी हरियाणवी भाषा में।
प्रदीप जी , आपने बहुत अच्छा प्रयास किया है.. उम्मीद है कि आप आगे भी जारी रखेंगे. हरियाणवी भाषा को ऎसे ही आगे ले जाते रहे
धन्यवाद..
( बबीता कन्यान करनाल के शामगढ़ से हैं और व्यवसाय से इंजीनियर हैं। )

बुधवार, 20 सितंबर 2017

वी एम बेचैन  :---  भिवानी के सुप्रसिद्ध कवि, पत्रकार एवं फिल्मकार श्री वी एम बेचैन द्वारा मेरे हरियाणवी उपन्यास ' जाट कहवै , सुण जाटणी ' पर दी गई प्रतिक्रिया प्रस्तुत है :- 
दस दिन पहले हिसार निवासी प्रदीप नील द्वारा लिखित हरियाणवी उपन्यास ' जाट कहवै , सुण जाटणी ' प्राप्त हुआ। लम्बे समय से भाई के इस उपन्यास की चर्चा सुनने को मिल रही थी। सबसे पहले तो धन्यवाद कि प्रदीप भाई ने मुझ तक अपना यह प्यार अपना उपन्यास पहुँचाया। 
दूसरी ख़ास बात जो पढ़ने के बाद मुझे इस उपन्यास में नज़र आई वो ये कि ,,,,प्रदीप जी ने बेहद ही सुलझे हुवे स्वभाव के साथ इसको लिखा है,,,228 पृष्ठ के इस उपन्यास को ,एकदम तो नहीं पढ़ पाया लेकिन दो तीन बैठक में टाइम निकालकर जैसे ही पढ़ा,,,,मज़ा आ गया,,,
हरियाणवी को आज ऐसे ही कलमकारों की जरूरत है जो हरियाणवी के मर्म को न केवल समझ सके बल्कि उसको अपनी साफ सुथरी लेखनी के माध्यम से जन जन तक पहुंचा सके,,,भाई प्रदीप को इस साफ़ सुथरे हरियाणवी प्रयास के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाये कि आप इसी तरह लिखते रहे और माँ बोली हरियाणवी की सेवा करते रहें।



जाट कहवै , सुण जाटणी : सुनीता करोथवाल : ---सबतै पैहलम तो उपन्यासकार आदरणी...

जाट कहवै , सुण जाटणी : सुनीता करोथवाल : ---सबतै पैहलम तो उपन्यासकार आदरणी...: सुनीता करोथवाल  : --- सबतै पैहलम तो उपन्यासकार आदरणीय श्री प्रदीप नील जी नै भोत-भोत  बधाई   �� �� �� साची कहूँ तै आजकाल च्यारूं कानी &#39...
सुनीता करोथवाल : ---सबतै पैहलम तो उपन्यासकार आदरणीय श्री प्रदीप नील जी नै भोत-भोत बधाई 💐💐💐

साची कहूँ तै आजकाल च्यारूं कानी ' जाट कहै सुण जाटणी ' की ए चर्चा सै बस । आर चर्चा होणी बी चाहिए , क्यूंक लिखण मैं लेखक नै कोये कसर ए नईं छोड्ड राक्खी । इस नॉवेल की सारयाँ तै बड्डी खासियत योये सै अक एके कहाणी म्है हरियाणे के आम जीवन तै लेके राजनीति तक,पढाई के सिस्टम तै लेकै मिलावट तक हर छोटी तै छोटी बुराई का लेखा-जोखा इतना कसूत दे राख्या सै अक एक पुराणी कहावत याद आग्गी "बात की बात, आर लात की लात ।"
हाम हरियाणे आल्यां खातर इसतै बड्डे मान की बात और के हो सकै सै अक ठेठ देसी बोली म्है लिख्या यो उपन्यास आपणी माट्टी की तो बात ए के , हरियाणा की सीम कै लाग्दे परदेसां म्है बी पोहंच लिया । उपन्यास के सारे पात्रां नै इतनी सुथरी ढाल एक कहाणी की माला म्है मोती से पिरोणा भोत ए मुस्कल काम रया होगा । आपणे समाज की सारी ए तो बुराई एके किताब म्है फिट करदी लिखणिये नै । म्हारे समाज म्है जगां जगां बणे गोलू देवता के मंदर ,किते धोती प्रसाद की मिलावट, किते हिंदी साहित्य पै कटाक्ष, राजनीति का भुण्डा खेल ,शिक्षा का व्यापार और सबतै बढ़िया आम जनता बी नईं छोड्डी । छोडनी बी नईं चइए , हाम बी दूध के धोए ना सां । जित बी नाचण गाण आळी दिक्खी, मजे लेण पहोंचे जावां सां । कौण के कह रया सै अक हामनै कोये मतलब नई ।
लेखक नै म्हारे घरां की सासू तै ले कै बजार म्है मर्दाना ताकत बाँड्ण आले झोला छाप डॉक्टरां तक नै लपेटै म्है ले लिया । आज कै जमाने म्है जिसनै देखो , ओए लेखक बणया हांडै सै। पर प्रदीप सर नै करारी चोट हरियाणवी में लिख कै जो समाज पै करी सै ,उसकी अणगिणत बधाई ए बधाई । प्रदीप सर आपनै तो झंडे गाड दिये ,देखो इब कोण माई का लाल इन नै उखाड़ै । बाकी हरियाणवी बोली मैं लिख कै जो आपने हरियाणवी बोली जो का मान बढाया सै, उस खातर हाथ जोड़कै आपनै प्रणाम ।
जय हो 🙏🙏🙏🙏

(भिवानी से सुनीता करोथवाल हिंदी की बहुत ही संवेदनशील और सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं। आप के कविता संग्रह हरियाणा साहित्य अकादमी में सहायता अनुदानार्थ विचाराधीन हैं। आपका अगला संग्रह कहानियों का आएगा। )

जाट कहवै , सुण जाटणी : अनिता ढांडा : --  न्यू तो बेरा था अक हरियाणवी बोली...

जाट कहवै , सुण जाटणी : अनिता ढांडा : --  न्यू तो बेरा था अक हरियाणवी बोली...: अनिता ढांडा : --  न्यू तो बेरा था अक हरियाणवी बोली म्हैं जो कविताई , सांग अर रागनी लिखे गए हैं, उनका कोए जवाब नहीं सै, पर इस बोली म्हैं ला...
सचिन बांगड़: ---- इतिहास गवाह है कि जिस भी बोलचाल के साधन यानि बोली और भाषा में साहित्य की रचना नहीं होती...वह या तो लुप्त हो जाया करती है , या फिर अपना मूल रूप खो बैठती है। सीधी सी बात है कि कान्वेंट स्कूलों की होड़ में बच्चा अंग्रेजी का ऑक्स कहना सीख जाता है , घर में हिंदी में बैल कहना भी सीख लेगा। मगर बलद बोला नहीं कि माँ-बाप की त्योरियां चढ़ी नहीं। ऐसे में दिक्कत यह है कि हिंदी-अंग्रेजी तो स्कूल सिखा देगा लेकिन अपनी बोली सिखाने वाला सिर्फ और सिर्फ एक ही स्कूल होता है , और वह अद्भुत स्कूल है माँ। और आजकल की मांएं ही हरियाणवी को गंवारू बोली कह कर परहेज करने लगी हैं। ऐसे में अपनी बोली जिन्दा रहे भी तो कैसे ?
. इसी मां बोली को जिन्दा रखने के लिए प्राणवायु के रूप में सामने आया है प्रदीप नील का ठेठ हरियाणवी बोली का नॉवेल ' जाट कहवै , सुण जाटणी '. हम हरियाणवियों को गर्व है 20 साल तक अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रदीप जी ने अपनी बोली को यह मान दिया। यह नॉवेल न केवल हमारी वर्तमान बल्कि भावी पीढ़ी को हमारी बोली और आसपास के वास्तविक माहौल से रूबरू कराता है। बेजोड़ कहानी के माध्यम से हमारी बोली की अनसुनी कहावतों , मुहावरों और परिवेश से परिचित होना है तो पढिए यह उपन्यास। हर हरियाणवी चाहे वह किसान हो , दुकानदार हो , स्कूल-कॉलेज का विद्यार्थी हो , मल्टी-नेशनल कम्पनी में हो या विदेश में ,यह हरियाणवी उपन्यास जरूर पढे...
अभी तो आम धारणा यही है कि हरियाणा में हरियाणवी में साहित्य नहीं रचा गया। मैं तो कहता हूँ कि आप सब लेखक का साथ देंगे तो हरियाणवी साहित्य न केवल अपने पांवों पर चलना बल्कि तरक्की के रास्ते दौड़ना भी शुरू कर देगा। .
प्रदीप नील जी की इस कोशिश को सलाम और बहुत बहुत बधाई....
हरियाणवी साहित्य के सिर की पगड़ी है यह उपन्यास मेरी नजरों में ..
लेखक ने उपन्यास के जरिए हमारी बोली में इतना कुछ समेट के रख दिया कि जो कोई भी भारत दर्शन करना चाहे ...बिना भारत आये भी कर सकता है। राजनीति ,धर्म ,जाति, बेरोजगारी,आम आदमी का प्रेम,गुस्सा,बेबसी,मौकापरस्ती कोई पहलू भी तो नहीं छोड़ा लेखक ने ,..228 पन्नों में ये सब रोचकता और व्यंग्यात्मक भाषा में लिखना वाकई एक करिश्मा है।
इसकी कहानी सिर्फ मेदनीपुर या हरियाणा की सीमा में सीमित नही रह सकती...ये विशुद्ध भारतीय सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था है
प्रमोद अम्बिका और वसुधा के अस्पताल वाले दृश्य ने और वसुधा और प्रमोद के हर दृश्य ने मुझे आपकी कलम का मुरीद बना दिया, प्रदीप जी।
जयंत और दुबे जी का चित्रण आपने ग़ज़ब का किया है
विलेन जरूर है लेकिन कई जगह बेचारे से भी लगे। धूर्त जयंत हर गाँव में बैठा है आज और हर पार्टी में दूबे जी है। कच्छाधारियों की कुरड़ी पे जब प्रमोद उगता है तो राजनैतिक और धार्मिक गधे उसे चर जाते है। उधर कम उम्र में विधवा हुई लाखों वसुधा अपने पुनः जीवन के अरमान लिए रोज घुट घुट के मरती है।
फैन तो मैं आपका पहले पन्ने पे ही हो गया था
खरीद के पढ़ने वाले पाठकों को समर्पित कर दी आपने पुस्तक। तेरा तुझको अर्पण वाली फील आ गई थी। हरियाणवी पुस्तक पाठकों को ही अर्पण कर दी ! कमाल !
प्रदीप नील जी, आपकी कलम से निकली हर एक पंक्ति लाजवाब है...भविष्य में भी आप इसी तरह माँ बोली की सेवा करते रहें।
आपकी आने वाली सभी रचनाओं के इंतज़ार में
सचिन बांगड़

( सचिन बांगड़ हिसार से हैं और फिलहाल चंडीगढ़ में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। आपकी हरियाणवी और हिंदी लेखन में बहुत रुचि है )
अनिता ढांडा : --  न्यू तो बेरा था अक हरियाणवी बोली म्हैं जो कविताई , सांग अर रागनी लिखे गए हैं, उनका कोए जवाब नहीं सै, पर इस बोली म्हैं लाजवाब नॉवेल बी लिख्या गया सै, यू बेरा पाट्या "प्रदीप नील" जी का उपन्यास " जाट कहवै सुण जाटणी" नै पढ कै । इस उपन्यास की सबतै पहली खासियत सै इसकी बोल्ली। इस तै पहले बी हरियाणवी म्हैं कुछ उपन्यास लिखे गए सैं, पर इस उपन्यास मैं इतनी ठेठ देहाती हरियाणवी म्है बात कैह्ण का स्टाइल ए सबतै न्यारा अर एंडी सै। इसनै पढकै या उम्मीद करी जा सकै सै अक हरियाणवी बोली नै भाषा का दरजा देण मैं यो उपन्यास एक नई पैहल करैगा , इसकी भाषा तै हरियाणवी व्याकरण नै मानक बी मिलैंगे ।
नई पीढी के अंगरेजी मीडियम मैं पढण आले जो बालक हरियाणवी बोल्लण मैं अटकैं सैं वैं बी आपणी बोल्ली नै गहराई तै समझ और सीख सकैं सैं। आमतौर पै साहित्यकार अर फिल्म आले जिस जनता नै बेकसूर बताया करैं सैं, उस्से जनता तै लेखक नै सीस्सा दिखाया है अक राजनीति, व्यापार अर शिक्षा म्है जो सड़ांध ऊठरी है, उसके ज़िम्मेदार हाम बी उतने ए सां जितना या जनता म्हारै नेता अर प्रशासन नै बताया करैं । इस उपन्यास मैं मेदनीपुर के बहाने तै पूरे भारत की बात बिना किसे लाग-लपेट कै कैह दी प्रदीप जी नै।
एक खास बात और बी है अक इस उपन्यास मैं आम जनता की जिंदगी मैं बात बातां मैं कही जाण आली कहावतां की गाद सी भर राखी है। इन कहावतां मैं जो चुटीलापण अर ठिठोली का अंदाज है उसका मुकाबला मुहावरे अर लोकोक्ति नहीं कर सकते। या ए तो पहचाण सै हरियाणा की बोल्ली की।
इसकी कहाणी का तो कोए मुकाबला ए नी , इसके पात्रां का थोड़ा जिक्र बी कर ल्यूं । दूबे इसमैं ओ दोमुंहा सांप सै जो आगे तै छेड़ो चए पाछै तै , डंक मारै ए मारैगा। पल्लेदारणी सुरसतां चिक्क्ड़ म्है रैह के बी मैली नी होंदी, पर बिच्यारी गल्लै जो बणी , उसी राम करै किसे गल्लै ना बणै । अर एक वा भाग की मारी वसुधा , जिसनै देखके याए कहावत याद आवै " रूप की रोवै अर भाग की खावै।" सारी कहाणी खत्म होइ तो मन्नै इस उपन्यास का अंत भोत पसंद आया।
लास्ट म्है एक चीज़ और कैह दयूं। बात सिर्फ इतनी नहीं सै अक जाट नै कही अर जाटणी नै सुणी। देखण अर सोचण की बात तो या सै अक इस उपन्यास कै जरियै तै हाम आपणी बोल्ली नै कड़ै तक पोंहचा सकां सां। हरियाणवी बोल्ली की या बात हरियाणा की सीम म्है ए नहीं रहणी चाहिए, देस की सीम तै बाहर तक पोंचाणा म्हारी बी जिम्मेदारी बणै सै। अर न्यूं तै सारे जाणै सैं अक जिम्मेदारी निभाण मैं तो ना मेदनीपुर आले पाछै रैंदे अर ना कदे हरियाणै आले रहे ।
( अनिता ढांडा का सांझेदारी में एक कविता संग्रह आया है ' पढ़ना मुझे भी ' . आप जींद से हैं। हिंदी साहित्य में एम ए हैं , नेट क्वालिफाइड हैं और अध्यापन में रत हैं। )

कृष्ण कौशिक : --- यूं तो उपन्यास को हम साहित्य की उस परिपाटी पर तौलते है जिसमे कथानक के साथ साथ चरित्र चित्रण ,देशकाल वातावरण, भाषा शैली एवं संवाद का समन्वय होता है । समीक्षा की दृष्टि से प्रस्तुत कथानक पर मैं अपनी व्यक्तिगत टिप्पणी केवल इस परिपाटी पर नही दूंगा ध्यातव्य रहे ये वो अनूठा नवीनतम प्रयोग है जिसके लिए माँ हरियाणवी बोली तरस रही थी उस माँ की उंगली प्रदीप नील वशिष्ठ जी के इस उपन्यास " जाट कहवे सुण जाटणी" ने पकड़कर उस ममता की कसक की अभिसिंचित कामना पूरी कर दी।
228 पन्ने "एक नई सोच नया प्रयास ' के वो भी ऐसे चित्रण में जिसमें सोचने मात्र से ही रूह लबलबाती है।
'अपणी बोली अपणी बात' कुर्बत की रवानगी तक अभिव्यक्ति को खुलकर खोलने का प्रमाण यहाँ इस बेहतरीन रचना के माध्यम से मिला है।
सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का,गली में घूमते नन्हे झूमते बच्चे की किलकारी का, तालाबो के किनारे वट वृक्ष की छांव में बैठे किसानों का, बगल में पनघट पर पानी से छलकती गगरी का, और दोपहर में एक बैठक मे हुक्के के साथ ताश खेलने की कल्पवृक्ष हरियाणवी संस्कृति को श्री वशिष्ठ जी ने अपनी भाषा से एवं सार्थक अनुप्रयोग से जीवंत कर दिया है।
शीर्षक पढ़ते ही मन मे आपार सैलाब मेरी माँ बोली हरियाणवी के लिए छलक पड़ा था, प. बंगाल में होते हुए तुरंत अमेज़न से मंगवाया और श्री वशिष्ठ जी को कृतज्ञतापूर्ण धन्यवाद अर्पित किया।
इसके सबसे दिलकश पहलू की बात करूं तो सबसे दिलचस्प इसकी भाषा शैली है,
इसमें ना केवल मुहावरे और लोकोक्तियों से भरे मख़ौल है बल्कि व्यंग्यात्मक का पुट भी है। जो नैतिकता का कैसेला स्वाद प्रसंगानुसार चखाते है।
मेदिनीपुर केवल कल्पना में रचा बसा है जबकि वास्तविकता ये है मेदनीपुर की जगह मुझे मेरा मौहल्ला नज़र आया।
"हरियाणवी भाषा के प्रेमचंद " की झलक मुझे व्यक्तिगत तौर पर सम्पूर्ण कथानक में मिली, वर्तमान समाज की राजनैतिक पृष्ठभूमि से लेकर घर तक कि मौकापरस्त नीतियां,जातिगत धर्म अराजकता के माहौल में एक और एक आम आदमी के भावभीने प्यार के पल आदर्शोन्मुखी विचारधारा को बलबत झकझोरने पर विवश कर गए।
वसुधा, प्रमोद ,जयंत, दुबे जी किसी भी चरित्र को उठा कर देखें तो न्यायगत शालीनता से भरपूर मर्म और तेजस्वी हमारी संस्कृति की अभिवृति देखने को मिली है,और इसका उद्देश्य संस्कृति के एक कोने तक सिमटकर नही रह गया बल्कि हमारी संस्कृति की उस परिकल्पना के औहदे तक पहुँचता है जहां से कर्मशक्त मानवीय पहलू फलसक्त अभिलाषा से अकिंचन सा अविरल घूँट गले से उतार रहा हो।
प्रस्तुत उपन्यास की पृष्ठभूमि की बात करे तो मुझे आँचलिक शैली की याद आ गयी। आपसी संवाद से तो मुँह में समझो पूंडरी (कैथल) की फिरनी, गोहाना की जलेबियाँ आ गयी। रस से परिपूर्ण पात्रों की भावना से मेल खाती ग्रामीण आँचल की शैली हमे अपने बचपन की यादों में ले जाती है।
प्रेम की नौका को पार लगाना भला कहाँ हर केवट के बस की बात होती है अंगारो से दहकती शोला सी भड़कती यादों को चाँदनी( वसुधा) की शीतलता से ठंडा करना पड़ता है।
हां ये कहना भी यहां आवश्यक बन पड़ा है शुरुवाती कुछ दृश्यों को महसूस करके जितनी कल्पना बनी कहीं कहीं एक दो दृश्य मे वो लापता हुई पर ये केवल नगण्य है। चूंकि सम्पूर्णता के दामन में किसी का स्थाईत्व नही होता। बस परिस्थितियां ही इंसान को हैवान बना देती है।
"एक सीढ़ी मिल गयी मंजिल मंजिल भी मिल जाएगी" इस सीख के साथ इस उपन्यास और भविष्य में आने वाले अगले अंक के लिए मेरी तरफ से प्रदीप नील जी को हृदय से बधाईऔर मुबारकबाद।।
उम्मीद करता हूँ कि आगामी अंक बाहुबली 2 से भी ज्यादा रोचक होगा।
कृष्ण कौशिक
केंद्रीय विद्यालय बेंगडुबी
दार्जिलिंग प. बंगाल
नीता सैनी : --- 

लेखक अपनी किताब बेचने के लिए कितने ही पापड़ बेलता है। और इधर प्रदीप जी हैं कि हरियाणा से बाहर का कोई पाठक उनका नॉवेल 'जाट कहवै सुण जाटणी' खरीदने का तरीका पूछे तो डराने लगते हैं " हरियाणवी पढ़ने में बहुत जोर आता है , तुम्हे हमारी बोली समझ नहीं आएगी ,सोच लो पूरे 228 पृष्ठ हैं , इतना समय है , तुम्हारे पास ?"
यही बातें कह कर इन्होने मुझे भी डराने की कोशिश की थी। लेकिन इन्हे पता नहीं था कि इनका पाला नीता सैनी से पड़ा है। नतीजा यह हुआ कि किताब मंगवा कर ही मानी। किताब एक महीना पहले आ गई थी लेकिन बाहर जाना पड़ गया, और पढ़ नहीं पाई। परसों वापिस आते ही सबसे पहले यह किताब उठाई और आज , अपने घर के सब घरेलू काम करते रहने के बावजूद दो दिन में ये उपन्यास खत्म भी हो गया । सच कहूं तो मुझे ये उपन्यास पढ़ने में कोई मुश्किल आई ही नहीं । बेशक , मैंने हरियाणवी भाषा की कोई कहानी पहली बार पढ़ी है लेकिन जानकर लोग जानते हैं कि हरियाणा ने दिल्ली को इतना घेरा हुआ है कि दिल्ली के पुराने गांवो की भाषा ही हरियाणवी ही लगती है । ये तो हम बचपन से ही सुनते आए हैं । कोई लाइन समझ नही आई एक बार दुबारा पढ़ ली , हो गई मेरी समस्या आसान।
यूँ तो ये उपन्यास हमारे समाज की दो बड़ी विसंगतियों , हमारे देश की राजनीति और संत महात्माओं की जड़ो को खोदता हास्य व्यंग्य पर आधारित है । लेकिन इन्हीं सब विसंगतियों के साथ इस उपन्यास में एक और कहानी चल रही है । स्कूल मास्टर प्रमोद और विधवा वसुधा की प्रेम कहानी । मासूम सी ये प्रेम कहानी राजनीति की भेंट चढ़ गई और राजनीति में फैली भ्र्ष्टाचार की जड़े शायद कभी नहीं खत्म होगी ।
ये उपन्यास इतना रोचक है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद रोचकता बनी ही रहती है कि आगे क्या होगा, आगे क्या होगा ?
दिल्ली की निवासी होने के नाते बस एक बात मुझे इस उपन्यास में बहुत खली इस उपन्यास में दिल्ली की छवि बहुत खराब दिखाई है । पाबन्दियाँ दिल्ली वालों पर भी होती हैं , दिल्ली वाले भी संस्कारी होते हैं । यह बात छोड़ दें तो उपन्यास ' भोत ए गज़ब का सै।
बहुत बहुत बधाई आपको प्रदीप नील वशिष्ठ जी । भविष्य में आप और भी कहानियां - उपन्यास लिखें और मुझ जैसे पाठक पढ़ते भी रहें ।
( नीता सैनी जी दिल्ली से हैं। खूब पढ़ती तो हैं ही लघुकथाएं भी लिख रही हैं। इनकी किताब जल्दी ही आए , यह शुभ कामना नीता जी को )

प्रवीण कुमार स्नेही :---
उपन्यास खत्म करे बहोत दिन हो लिए। जिस चाव तैं मंगाया था, उसे चाव तैं बाकी सारी किताब आधम छोड़ कै पढ्या बी। जो हिम्मत भाई प्रदीप नील जी नै उठाई, उसकी जितणी तारीफ करो थोड़ी है। बहोत सी बात हैं उपन्यास के बारै मै, जो पहले कईयों नैं समीक्षा मैं कह बी लीं। वो नीं कहता। मैं तो बस इतना जाणूं अक हरियाणवी हूं लेकिन यो उपन्यास पढ़ कै बेरा पाट्या के असल हरियाणवी के होवै सै। सुरू-सुरू मैं महसूस होया के आपनै उपमा और कहावतें घणी डाल दीं। फेर आगै मेरा वहम दूर होग्या। दरअसल यैं उपमा और कहावतें नीं हैं, ये तो म्हारा दर्शन शास्त्र है। हरियाणवी दर्शन शास्त्र के कई उदाहरण इस उपन्यास मैं देखण नैं मिलैं हैं। आप खुद पढ़़ सको हो। अर जो भाई इन नैं दर्शन ना मान्नैं , तो वो इननैं निरी कहावत भी ना मान्नैं। यैं तो टेम-टेम पै लागण आळी डाट हैं। प्रदीप भाई का एक दो आदमी मैं डाट मार कै जी नीं भर्या तो यो भरोटा दे मार्या। इब सम्भाळो, हरियाणे आल्यो।
प्रदीप नील जी को कविता गोष्ठियां मैं सुणा कई बार है, लेकिन पढ्या पहली बार। बड़े भाई दोनूं कान्नैं तैं बहोत मजेदार निकले। अपणे समाज मैं सम्भावनाएं बहोत हैं, शिक्षा हो चाए राजनीति, लेकिन अपणा समाज इन सम्भावनाओं को सहज ही स्वीकार नहीं करता। दूबे जी को बनाणे वाले भी हम हैं और सिसिर को दुुतकारणे वाले भी, दुतकारणे के बाद खुशी से अपनाणे वाले भी। कहाणी में से प्रमोद बहोत पहले चल्या गया लेकिन हरेक पाठक के सबसे नजदीक वही रहैगा। प्रदीप जी ने अपणे हर पात्र को बराबर टेम दिया, भेदभाव नीं कर्या। बड़े मजे से लिखा गया उपन्यास है, मजे-मजे में पढ़ने लायक, लेकिन मजाक नहीं। गहन चिन्ताएं हैं इसमैं देश की, समाज की, इन्सान की। प्रदीप नील जी नै कमाल की रचना की है। सुरू में लग्या पता नीं यो मेदनीपुर कहां होगा। लेकिन ज्युं ज्युं उपन्यास के पन्ने पलटे, मेदनीपुर नेड़ै आता गया। अर जिस टेम मनैं उपन्यास का आखरी पन्ना पढ़ कै पलटया , उसे टेम मेदनीपुर मेरे भीतर था।
सोच्या तो न्यूं था अक 'जाट कहवै , सुण जाटणी ' पै मेरी बात हिन्दी मैं लिखूंगा। पर यो उपन्यास पढ़े पाछे हरियाणवी की कुछ ज्यादा ए झाल उठैं हैं, ज्यां तै आपणी ए बोली मैं बात कैह दयूं।
- प्रवीण कुमार स्नेही
( प्रवीण जी मूलत : जींद जिले से हैं और इन दिनों गोहाना शहर में इलाहाबाद बैंक में कार्यरत हैं। आप शानदार व्यंग्य कविताएं लिखते हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी के अनुदान से आपका बहुत बढ़िया काव्य-संकलन ' सामर्थ्य ' प्रकाशित हो चुका है। फ़िलहाल आप अध्ययन-मनन में लीन हैं। जल्दी ही हमें आपकी नई रचनाएं पढ़ने को मिलें, यही दुआ हम सब की तरफ से । )
मनजीत सिंह भ्याण: --    सबतै पेहल्या तो  प्रदीप मास्टर जी  आपनै और आपणै सारै साथियां नै राम- राम !
मास्टर जी, आपका उपन्यास बहौत आच्छी तरियाँ पढया जी लाके नै । मड़ी टैम की कमी थी ज्यांतै समीक्षा थोड़ी छोटी लिखण पाया पर उसमै भी पूरा निचोड़ काडण की कोशिश करी सै। फैर भी कींमै कमी हो तो माफी दे दियो !
मास्टर जी, नौकरी म्हैं तै बचया खुच्या टैम काड के आपका लिख्योड़ा उपन्यास "जाट कहवै - सुण जाटणी " पढय़ा तो घणा मजा आग्या। जिसमै पराणी टैम आल्ली कहावत अर मुहावरें, जो ज़माए मरगै थे, दुबारा ज्युन्दे होंदे दिक्खे ! कई साल तै हरिय़ाणवी सुणय़ा ज़रूर करदै परंतु लिखणी कोनी आया करदी। अर इब्ब वा भी सीखगे ! इसे उपन्यास तै ज्ञान होया अक क्यूकर बड़े बुढय़ा की बात मानणी पड़य़ा करदी ! अर ईब तो यो भी बैरा पाटग्या अक हरिय़ाणा के लोग भोलैं डोले , साच्चै दिल के अर ईमानदार होया करै हैं ! बीच - बीच में सरकारी मेहकम्मे , पुलिस अर मीडिय़ा की भी आच्छी कलास लाग गी ! उपन्यास म्है कई मोकै हांसण के मिले तो कई जगां दिल उदास भी भोत होया ! नेताअं की चिंता प्रकट करण का तरीका बी समझ आग्या ! भाषा इतनी आसान अक आम आदमी बी इसनै पढ़ सकै।
मास्टर जी, इब ओ टैम दूर कोनी जब सारै भाईयां की दुआ तै अर आप ज़िसै लेखकां की लग्न तै हरिय़ाणवी संस्कृती और भाषा आसमान की ऊंचाई तक पोहंचेगी ! हाँ, प्रमोद नै मार के आपनै बड्डिया नी करया ! मास्टर जी, उपन्यास सारै का सारा जमा एंडी है ! कितै लाइन तो दूर की बात अक्षर की बी गलती कोन्या ! मास्टर जी, मैं एक छोटा सा आदमी एक महान शख्सियत की रचना पढके गर्व मेंहसूश कर रया सूं। भगवान पै याए दुआ मांगूं अक लिक्खण म्है आप आए दिन और ऊँचे चढ़दे जाओ।
भोत मेहरबानी। एक बै फेर सारे भाण -भाइयां नै राम -राम।
( श्री मनजीत सिंह भ्याण मूलतः हिसार जिले के सरसौद गाँव से हैं। आप चंडीगढ़ ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग में बतौर कंडक्टर कार्यरत हैं। यह पहला हरियाणवी उपन्यास है जो मनजीत ने पढ़ा। इतनी थका देने वाली सख्त नौकरी के बावजूद इन्होने मेरे इस उपन्यास को न केवल पढ़ा बल्कि अपनी अमूल्य राय से मुझे अवगत भी कराया। तभी तो कहता हूँ कि मनजीत ने मेरा तो मन ही जीत लिया। )

विकास हरियाणवी सातरोड़ : ---  सबसे पहले तो उन महान मात-पिता को सलाम जिन्होंने ऐसे महान व्यक्तित्व "प्रदीप नील" को अपने महान संस्कारों से इस काबिल बनाया कि वो अपने प्यारे प्रदेश हरियाणा के लिए इतना कुछ कर पाए।
मैं इस पुस्तक को पढकर इतना अभिभूत हुआ कि पहले पन्ने को पढते-2 बचपन में चला गया और अभी तक भी वापिस नही लौट पाया हूँ।
इस पुस्तक 
 "जाट कहवै - सुण जाटणी " को मैं दो बार पढ चुका हूँ।
जहाँ तक सवाल है माँ बोली हरियाणवी के रख-रखाव का,तो इसमें कोई शक नही कि प्रदीप जी के इस सराहनीय प्रयास से हरियाणवी बोली विदेशों तक भी पहुँच चुकी है।
इस महान कार्य का मैं शब्दो में धन्यवाद नही कर सकता।
अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि हर सच्चे हरियाणवी को इस तरह का प्रयास जरूर करना चाहिए ।
हरियाणा और हरियाणवी के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ,
आपका अपना विकास हरियाणवी।