बुधवार, 20 सितंबर 2017

अनिता ढांडा : --  न्यू तो बेरा था अक हरियाणवी बोली म्हैं जो कविताई , सांग अर रागनी लिखे गए हैं, उनका कोए जवाब नहीं सै, पर इस बोली म्हैं लाजवाब नॉवेल बी लिख्या गया सै, यू बेरा पाट्या "प्रदीप नील" जी का उपन्यास " जाट कहवै सुण जाटणी" नै पढ कै । इस उपन्यास की सबतै पहली खासियत सै इसकी बोल्ली। इस तै पहले बी हरियाणवी म्हैं कुछ उपन्यास लिखे गए सैं, पर इस उपन्यास मैं इतनी ठेठ देहाती हरियाणवी म्है बात कैह्ण का स्टाइल ए सबतै न्यारा अर एंडी सै। इसनै पढकै या उम्मीद करी जा सकै सै अक हरियाणवी बोली नै भाषा का दरजा देण मैं यो उपन्यास एक नई पैहल करैगा , इसकी भाषा तै हरियाणवी व्याकरण नै मानक बी मिलैंगे ।
नई पीढी के अंगरेजी मीडियम मैं पढण आले जो बालक हरियाणवी बोल्लण मैं अटकैं सैं वैं बी आपणी बोल्ली नै गहराई तै समझ और सीख सकैं सैं। आमतौर पै साहित्यकार अर फिल्म आले जिस जनता नै बेकसूर बताया करैं सैं, उस्से जनता तै लेखक नै सीस्सा दिखाया है अक राजनीति, व्यापार अर शिक्षा म्है जो सड़ांध ऊठरी है, उसके ज़िम्मेदार हाम बी उतने ए सां जितना या जनता म्हारै नेता अर प्रशासन नै बताया करैं । इस उपन्यास मैं मेदनीपुर के बहाने तै पूरे भारत की बात बिना किसे लाग-लपेट कै कैह दी प्रदीप जी नै।
एक खास बात और बी है अक इस उपन्यास मैं आम जनता की जिंदगी मैं बात बातां मैं कही जाण आली कहावतां की गाद सी भर राखी है। इन कहावतां मैं जो चुटीलापण अर ठिठोली का अंदाज है उसका मुकाबला मुहावरे अर लोकोक्ति नहीं कर सकते। या ए तो पहचाण सै हरियाणा की बोल्ली की।
इसकी कहाणी का तो कोए मुकाबला ए नी , इसके पात्रां का थोड़ा जिक्र बी कर ल्यूं । दूबे इसमैं ओ दोमुंहा सांप सै जो आगे तै छेड़ो चए पाछै तै , डंक मारै ए मारैगा। पल्लेदारणी सुरसतां चिक्क्ड़ म्है रैह के बी मैली नी होंदी, पर बिच्यारी गल्लै जो बणी , उसी राम करै किसे गल्लै ना बणै । अर एक वा भाग की मारी वसुधा , जिसनै देखके याए कहावत याद आवै " रूप की रोवै अर भाग की खावै।" सारी कहाणी खत्म होइ तो मन्नै इस उपन्यास का अंत भोत पसंद आया।
लास्ट म्है एक चीज़ और कैह दयूं। बात सिर्फ इतनी नहीं सै अक जाट नै कही अर जाटणी नै सुणी। देखण अर सोचण की बात तो या सै अक इस उपन्यास कै जरियै तै हाम आपणी बोल्ली नै कड़ै तक पोंहचा सकां सां। हरियाणवी बोल्ली की या बात हरियाणा की सीम म्है ए नहीं रहणी चाहिए, देस की सीम तै बाहर तक पोंचाणा म्हारी बी जिम्मेदारी बणै सै। अर न्यूं तै सारे जाणै सैं अक जिम्मेदारी निभाण मैं तो ना मेदनीपुर आले पाछै रैंदे अर ना कदे हरियाणै आले रहे ।
( अनिता ढांडा का सांझेदारी में एक कविता संग्रह आया है ' पढ़ना मुझे भी ' . आप जींद से हैं। हिंदी साहित्य में एम ए हैं , नेट क्वालिफाइड हैं और अध्यापन में रत हैं। )

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