नीता सैनी : ---
लेखक अपनी किताब बेचने के लिए कितने ही पापड़ बेलता है। और इधर प्रदीप जी हैं कि हरियाणा से बाहर का कोई पाठक उनका नॉवेल 'जाट कहवै सुण जाटणी' खरीदने का तरीका पूछे तो डराने लगते हैं " हरियाणवी पढ़ने में बहुत जोर आता है , तुम्हे हमारी बोली समझ नहीं आएगी ,सोच लो पूरे 228 पृष्ठ हैं , इतना समय है , तुम्हारे पास ?"
यही बातें कह कर इन्होने मुझे भी डराने की कोशिश की थी। लेकिन इन्हे पता नहीं था कि इनका पाला नीता सैनी से पड़ा है। नतीजा यह हुआ कि किताब मंगवा कर ही मानी। किताब एक महीना पहले आ गई थी लेकिन बाहर जाना पड़ गया, और पढ़ नहीं पाई। परसों वापिस आते ही सबसे पहले यह किताब उठाई और आज , अपने घर के सब घरेलू काम करते रहने के बावजूद दो दिन में ये उपन्यास खत्म भी हो गया । सच कहूं तो मुझे ये उपन्यास पढ़ने में कोई मुश्किल आई ही नहीं । बेशक , मैंने हरियाणवी भाषा की कोई कहानी पहली बार पढ़ी है लेकिन जानकर लोग जानते हैं कि हरियाणा ने दिल्ली को इतना घेरा हुआ है कि दिल्ली के पुराने गांवो की भाषा ही हरियाणवी ही लगती है । ये तो हम बचपन से ही सुनते आए हैं । कोई लाइन समझ नही आई एक बार दुबारा पढ़ ली , हो गई मेरी समस्या आसान।
यूँ तो ये उपन्यास हमारे समाज की दो बड़ी विसंगतियों , हमारे देश की राजनीति और संत महात्माओं की जड़ो को खोदता हास्य व्यंग्य पर आधारित है । लेकिन इन्हीं सब विसंगतियों के साथ इस उपन्यास में एक और कहानी चल रही है । स्कूल मास्टर प्रमोद और विधवा वसुधा की प्रेम कहानी । मासूम सी ये प्रेम कहानी राजनीति की भेंट चढ़ गई और राजनीति में फैली भ्र्ष्टाचार की जड़े शायद कभी नहीं खत्म होगी ।
ये उपन्यास इतना रोचक है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद रोचकता बनी ही रहती है कि आगे क्या होगा, आगे क्या होगा ?
दिल्ली की निवासी होने के नाते बस एक बात मुझे इस उपन्यास में बहुत खली इस उपन्यास में दिल्ली की छवि बहुत खराब दिखाई है । पाबन्दियाँ दिल्ली वालों पर भी होती हैं , दिल्ली वाले भी संस्कारी होते हैं । यह बात छोड़ दें तो उपन्यास ' भोत ए गज़ब का सै।
बहुत बहुत बधाई आपको प्रदीप नील वशिष्ठ जी । भविष्य में आप और भी कहानियां - उपन्यास लिखें और मुझ जैसे पाठक पढ़ते भी रहें ।
( नीता सैनी जी दिल्ली से हैं। खूब पढ़ती तो हैं ही लघुकथाएं भी लिख रही हैं। इनकी किताब जल्दी ही आए , यह शुभ कामना नीता जी को )

यही बातें कह कर इन्होने मुझे भी डराने की कोशिश की थी। लेकिन इन्हे पता नहीं था कि इनका पाला नीता सैनी से पड़ा है। नतीजा यह हुआ कि किताब मंगवा कर ही मानी। किताब एक महीना पहले आ गई थी लेकिन बाहर जाना पड़ गया, और पढ़ नहीं पाई। परसों वापिस आते ही सबसे पहले यह किताब उठाई और आज , अपने घर के सब घरेलू काम करते रहने के बावजूद दो दिन में ये उपन्यास खत्म भी हो गया । सच कहूं तो मुझे ये उपन्यास पढ़ने में कोई मुश्किल आई ही नहीं । बेशक , मैंने हरियाणवी भाषा की कोई कहानी पहली बार पढ़ी है लेकिन जानकर लोग जानते हैं कि हरियाणा ने दिल्ली को इतना घेरा हुआ है कि दिल्ली के पुराने गांवो की भाषा ही हरियाणवी ही लगती है । ये तो हम बचपन से ही सुनते आए हैं । कोई लाइन समझ नही आई एक बार दुबारा पढ़ ली , हो गई मेरी समस्या आसान।
यूँ तो ये उपन्यास हमारे समाज की दो बड़ी विसंगतियों , हमारे देश की राजनीति और संत महात्माओं की जड़ो को खोदता हास्य व्यंग्य पर आधारित है । लेकिन इन्हीं सब विसंगतियों के साथ इस उपन्यास में एक और कहानी चल रही है । स्कूल मास्टर प्रमोद और विधवा वसुधा की प्रेम कहानी । मासूम सी ये प्रेम कहानी राजनीति की भेंट चढ़ गई और राजनीति में फैली भ्र्ष्टाचार की जड़े शायद कभी नहीं खत्म होगी ।
ये उपन्यास इतना रोचक है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद रोचकता बनी ही रहती है कि आगे क्या होगा, आगे क्या होगा ?
दिल्ली की निवासी होने के नाते बस एक बात मुझे इस उपन्यास में बहुत खली इस उपन्यास में दिल्ली की छवि बहुत खराब दिखाई है । पाबन्दियाँ दिल्ली वालों पर भी होती हैं , दिल्ली वाले भी संस्कारी होते हैं । यह बात छोड़ दें तो उपन्यास ' भोत ए गज़ब का सै।
बहुत बहुत बधाई आपको प्रदीप नील वशिष्ठ जी । भविष्य में आप और भी कहानियां - उपन्यास लिखें और मुझ जैसे पाठक पढ़ते भी रहें ।
( नीता सैनी जी दिल्ली से हैं। खूब पढ़ती तो हैं ही लघुकथाएं भी लिख रही हैं। इनकी किताब जल्दी ही आए , यह शुभ कामना नीता जी को )

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