बुधवार, 20 सितंबर 2017

प्रवीण कुमार स्नेही :---
उपन्यास खत्म करे बहोत दिन हो लिए। जिस चाव तैं मंगाया था, उसे चाव तैं बाकी सारी किताब आधम छोड़ कै पढ्या बी। जो हिम्मत भाई प्रदीप नील जी नै उठाई, उसकी जितणी तारीफ करो थोड़ी है। बहोत सी बात हैं उपन्यास के बारै मै, जो पहले कईयों नैं समीक्षा मैं कह बी लीं। वो नीं कहता। मैं तो बस इतना जाणूं अक हरियाणवी हूं लेकिन यो उपन्यास पढ़ कै बेरा पाट्या के असल हरियाणवी के होवै सै। सुरू-सुरू मैं महसूस होया के आपनै उपमा और कहावतें घणी डाल दीं। फेर आगै मेरा वहम दूर होग्या। दरअसल यैं उपमा और कहावतें नीं हैं, ये तो म्हारा दर्शन शास्त्र है। हरियाणवी दर्शन शास्त्र के कई उदाहरण इस उपन्यास मैं देखण नैं मिलैं हैं। आप खुद पढ़़ सको हो। अर जो भाई इन नैं दर्शन ना मान्नैं , तो वो इननैं निरी कहावत भी ना मान्नैं। यैं तो टेम-टेम पै लागण आळी डाट हैं। प्रदीप भाई का एक दो आदमी मैं डाट मार कै जी नीं भर्या तो यो भरोटा दे मार्या। इब सम्भाळो, हरियाणे आल्यो।
प्रदीप नील जी को कविता गोष्ठियां मैं सुणा कई बार है, लेकिन पढ्या पहली बार। बड़े भाई दोनूं कान्नैं तैं बहोत मजेदार निकले। अपणे समाज मैं सम्भावनाएं बहोत हैं, शिक्षा हो चाए राजनीति, लेकिन अपणा समाज इन सम्भावनाओं को सहज ही स्वीकार नहीं करता। दूबे जी को बनाणे वाले भी हम हैं और सिसिर को दुुतकारणे वाले भी, दुतकारणे के बाद खुशी से अपनाणे वाले भी। कहाणी में से प्रमोद बहोत पहले चल्या गया लेकिन हरेक पाठक के सबसे नजदीक वही रहैगा। प्रदीप जी ने अपणे हर पात्र को बराबर टेम दिया, भेदभाव नीं कर्या। बड़े मजे से लिखा गया उपन्यास है, मजे-मजे में पढ़ने लायक, लेकिन मजाक नहीं। गहन चिन्ताएं हैं इसमैं देश की, समाज की, इन्सान की। प्रदीप नील जी नै कमाल की रचना की है। सुरू में लग्या पता नीं यो मेदनीपुर कहां होगा। लेकिन ज्युं ज्युं उपन्यास के पन्ने पलटे, मेदनीपुर नेड़ै आता गया। अर जिस टेम मनैं उपन्यास का आखरी पन्ना पढ़ कै पलटया , उसे टेम मेदनीपुर मेरे भीतर था।
सोच्या तो न्यूं था अक 'जाट कहवै , सुण जाटणी ' पै मेरी बात हिन्दी मैं लिखूंगा। पर यो उपन्यास पढ़े पाछे हरियाणवी की कुछ ज्यादा ए झाल उठैं हैं, ज्यां तै आपणी ए बोली मैं बात कैह दयूं।
- प्रवीण कुमार स्नेही
( प्रवीण जी मूलत : जींद जिले से हैं और इन दिनों गोहाना शहर में इलाहाबाद बैंक में कार्यरत हैं। आप शानदार व्यंग्य कविताएं लिखते हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी के अनुदान से आपका बहुत बढ़िया काव्य-संकलन ' सामर्थ्य ' प्रकाशित हो चुका है। फ़िलहाल आप अध्ययन-मनन में लीन हैं। जल्दी ही हमें आपकी नई रचनाएं पढ़ने को मिलें, यही दुआ हम सब की तरफ से । )

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें