कृष्ण कौशिक : --- यूं तो उपन्यास को हम साहित्य की उस परिपाटी पर तौलते है जिसमे कथानक के साथ साथ चरित्र चित्रण ,देशकाल वातावरण, भाषा शैली एवं संवाद का समन्वय होता है । समीक्षा की दृष्टि से प्रस्तुत कथानक पर मैं अपनी व्यक्तिगत टिप्पणी केवल इस परिपाटी पर नही दूंगा ध्यातव्य रहे ये वो अनूठा नवीनतम प्रयोग है जिसके लिए माँ हरियाणवी बोली तरस रही थी उस माँ की उंगली प्रदीप नील वशिष्ठ जी के इस उपन्यास " जाट कहवे सुण जाटणी" ने पकड़कर उस ममता की कसक की अभिसिंचित कामना पूरी कर दी।
228 पन्ने "एक नई सोच नया प्रयास ' के वो भी ऐसे चित्रण में जिसमें सोचने मात्र से ही रूह लबलबाती है।
'अपणी बोली अपणी बात' कुर्बत की रवानगी तक अभिव्यक्ति को खुलकर खोलने का प्रमाण यहाँ इस बेहतरीन रचना के माध्यम से मिला है।
सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का,गली में घूमते नन्हे झूमते बच्चे की किलकारी का, तालाबो के किनारे वट वृक्ष की छांव में बैठे किसानों का, बगल में पनघट पर पानी से छलकती गगरी का, और दोपहर में एक बैठक मे हुक्के के साथ ताश खेलने की कल्पवृक्ष हरियाणवी संस्कृति को श्री वशिष्ठ जी ने अपनी भाषा से एवं सार्थक अनुप्रयोग से जीवंत कर दिया है।
शीर्षक पढ़ते ही मन मे आपार सैलाब मेरी माँ बोली हरियाणवी के लिए छलक पड़ा था, प. बंगाल में होते हुए तुरंत अमेज़न से मंगवाया और श्री वशिष्ठ जी को कृतज्ञतापूर्ण धन्यवाद अर्पित किया।
इसके सबसे दिलकश पहलू की बात करूं तो सबसे दिलचस्प इसकी भाषा शैली है,
इसमें ना केवल मुहावरे और लोकोक्तियों से भरे मख़ौल है बल्कि व्यंग्यात्मक का पुट भी है। जो नैतिकता का कैसेला स्वाद प्रसंगानुसार चखाते है।
मेदिनीपुर केवल कल्पना में रचा बसा है जबकि वास्तविकता ये है मेदनीपुर की जगह मुझे मेरा मौहल्ला नज़र आया।
"हरियाणवी भाषा के प्रेमचंद " की झलक मुझे व्यक्तिगत तौर पर सम्पूर्ण कथानक में मिली, वर्तमान समाज की राजनैतिक पृष्ठभूमि से लेकर घर तक कि मौकापरस्त नीतियां,जातिगत धर्म अराजकता के माहौल में एक और एक आम आदमी के भावभीने प्यार के पल आदर्शोन्मुखी विचारधारा को बलबत झकझोरने पर विवश कर गए।
वसुधा, प्रमोद ,जयंत, दुबे जी किसी भी चरित्र को उठा कर देखें तो न्यायगत शालीनता से भरपूर मर्म और तेजस्वी हमारी संस्कृति की अभिवृति देखने को मिली है,और इसका उद्देश्य संस्कृति के एक कोने तक सिमटकर नही रह गया बल्कि हमारी संस्कृति की उस परिकल्पना के औहदे तक पहुँचता है जहां से कर्मशक्त मानवीय पहलू फलसक्त अभिलाषा से अकिंचन सा अविरल घूँट गले से उतार रहा हो।
प्रस्तुत उपन्यास की पृष्ठभूमि की बात करे तो मुझे आँचलिक शैली की याद आ गयी। आपसी संवाद से तो मुँह में समझो पूंडरी (कैथल) की फिरनी, गोहाना की जलेबियाँ आ गयी। रस से परिपूर्ण पात्रों की भावना से मेल खाती ग्रामीण आँचल की शैली हमे अपने बचपन की यादों में ले जाती है।
प्रेम की नौका को पार लगाना भला कहाँ हर केवट के बस की बात होती है अंगारो से दहकती शोला सी भड़कती यादों को चाँदनी( वसुधा) की शीतलता से ठंडा करना पड़ता है।
हां ये कहना भी यहां आवश्यक बन पड़ा है शुरुवाती कुछ दृश्यों को महसूस करके जितनी कल्पना बनी कहीं कहीं एक दो दृश्य मे वो लापता हुई पर ये केवल नगण्य है। चूंकि सम्पूर्णता के दामन में किसी का स्थाईत्व नही होता। बस परिस्थितियां ही इंसान को हैवान बना देती है।
"एक सीढ़ी मिल गयी मंजिल मंजिल भी मिल जाएगी" इस सीख के साथ इस उपन्यास और भविष्य में आने वाले अगले अंक के लिए मेरी तरफ से प्रदीप नील जी को हृदय से बधाईऔर मुबारकबाद।।
उम्मीद करता हूँ कि आगामी अंक बाहुबली 2 से भी ज्यादा रोचक होगा।
228 पन्ने "एक नई सोच नया प्रयास ' के वो भी ऐसे चित्रण में जिसमें सोचने मात्र से ही रूह लबलबाती है।
'अपणी बोली अपणी बात' कुर्बत की रवानगी तक अभिव्यक्ति को खुलकर खोलने का प्रमाण यहाँ इस बेहतरीन रचना के माध्यम से मिला है।
सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का,गली में घूमते नन्हे झूमते बच्चे की किलकारी का, तालाबो के किनारे वट वृक्ष की छांव में बैठे किसानों का, बगल में पनघट पर पानी से छलकती गगरी का, और दोपहर में एक बैठक मे हुक्के के साथ ताश खेलने की कल्पवृक्ष हरियाणवी संस्कृति को श्री वशिष्ठ जी ने अपनी भाषा से एवं सार्थक अनुप्रयोग से जीवंत कर दिया है।
शीर्षक पढ़ते ही मन मे आपार सैलाब मेरी माँ बोली हरियाणवी के लिए छलक पड़ा था, प. बंगाल में होते हुए तुरंत अमेज़न से मंगवाया और श्री वशिष्ठ जी को कृतज्ञतापूर्ण धन्यवाद अर्पित किया।
इसके सबसे दिलकश पहलू की बात करूं तो सबसे दिलचस्प इसकी भाषा शैली है,
इसमें ना केवल मुहावरे और लोकोक्तियों से भरे मख़ौल है बल्कि व्यंग्यात्मक का पुट भी है। जो नैतिकता का कैसेला स्वाद प्रसंगानुसार चखाते है।
मेदिनीपुर केवल कल्पना में रचा बसा है जबकि वास्तविकता ये है मेदनीपुर की जगह मुझे मेरा मौहल्ला नज़र आया।
"हरियाणवी भाषा के प्रेमचंद " की झलक मुझे व्यक्तिगत तौर पर सम्पूर्ण कथानक में मिली, वर्तमान समाज की राजनैतिक पृष्ठभूमि से लेकर घर तक कि मौकापरस्त नीतियां,जातिगत धर्म अराजकता के माहौल में एक और एक आम आदमी के भावभीने प्यार के पल आदर्शोन्मुखी विचारधारा को बलबत झकझोरने पर विवश कर गए।
वसुधा, प्रमोद ,जयंत, दुबे जी किसी भी चरित्र को उठा कर देखें तो न्यायगत शालीनता से भरपूर मर्म और तेजस्वी हमारी संस्कृति की अभिवृति देखने को मिली है,और इसका उद्देश्य संस्कृति के एक कोने तक सिमटकर नही रह गया बल्कि हमारी संस्कृति की उस परिकल्पना के औहदे तक पहुँचता है जहां से कर्मशक्त मानवीय पहलू फलसक्त अभिलाषा से अकिंचन सा अविरल घूँट गले से उतार रहा हो।
प्रस्तुत उपन्यास की पृष्ठभूमि की बात करे तो मुझे आँचलिक शैली की याद आ गयी। आपसी संवाद से तो मुँह में समझो पूंडरी (कैथल) की फिरनी, गोहाना की जलेबियाँ आ गयी। रस से परिपूर्ण पात्रों की भावना से मेल खाती ग्रामीण आँचल की शैली हमे अपने बचपन की यादों में ले जाती है।
प्रेम की नौका को पार लगाना भला कहाँ हर केवट के बस की बात होती है अंगारो से दहकती शोला सी भड़कती यादों को चाँदनी( वसुधा) की शीतलता से ठंडा करना पड़ता है।
हां ये कहना भी यहां आवश्यक बन पड़ा है शुरुवाती कुछ दृश्यों को महसूस करके जितनी कल्पना बनी कहीं कहीं एक दो दृश्य मे वो लापता हुई पर ये केवल नगण्य है। चूंकि सम्पूर्णता के दामन में किसी का स्थाईत्व नही होता। बस परिस्थितियां ही इंसान को हैवान बना देती है।
"एक सीढ़ी मिल गयी मंजिल मंजिल भी मिल जाएगी" इस सीख के साथ इस उपन्यास और भविष्य में आने वाले अगले अंक के लिए मेरी तरफ से प्रदीप नील जी को हृदय से बधाईऔर मुबारकबाद।।
उम्मीद करता हूँ कि आगामी अंक बाहुबली 2 से भी ज्यादा रोचक होगा।
कृष्ण कौशिक
केंद्रीय विद्यालय बेंगडुबी
दार्जिलिंग प. बंगाल
केंद्रीय विद्यालय बेंगडुबी
दार्जिलिंग प. बंगाल

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