बुधवार, 20 सितंबर 2017

मनजीत सिंह भ्याण: --    सबतै पेहल्या तो  प्रदीप मास्टर जी  आपनै और आपणै सारै साथियां नै राम- राम !
मास्टर जी, आपका उपन्यास बहौत आच्छी तरियाँ पढया जी लाके नै । मड़ी टैम की कमी थी ज्यांतै समीक्षा थोड़ी छोटी लिखण पाया पर उसमै भी पूरा निचोड़ काडण की कोशिश करी सै। फैर भी कींमै कमी हो तो माफी दे दियो !
मास्टर जी, नौकरी म्हैं तै बचया खुच्या टैम काड के आपका लिख्योड़ा उपन्यास "जाट कहवै - सुण जाटणी " पढय़ा तो घणा मजा आग्या। जिसमै पराणी टैम आल्ली कहावत अर मुहावरें, जो ज़माए मरगै थे, दुबारा ज्युन्दे होंदे दिक्खे ! कई साल तै हरिय़ाणवी सुणय़ा ज़रूर करदै परंतु लिखणी कोनी आया करदी। अर इब्ब वा भी सीखगे ! इसे उपन्यास तै ज्ञान होया अक क्यूकर बड़े बुढय़ा की बात मानणी पड़य़ा करदी ! अर ईब तो यो भी बैरा पाटग्या अक हरिय़ाणा के लोग भोलैं डोले , साच्चै दिल के अर ईमानदार होया करै हैं ! बीच - बीच में सरकारी मेहकम्मे , पुलिस अर मीडिय़ा की भी आच्छी कलास लाग गी ! उपन्यास म्है कई मोकै हांसण के मिले तो कई जगां दिल उदास भी भोत होया ! नेताअं की चिंता प्रकट करण का तरीका बी समझ आग्या ! भाषा इतनी आसान अक आम आदमी बी इसनै पढ़ सकै।
मास्टर जी, इब ओ टैम दूर कोनी जब सारै भाईयां की दुआ तै अर आप ज़िसै लेखकां की लग्न तै हरिय़ाणवी संस्कृती और भाषा आसमान की ऊंचाई तक पोहंचेगी ! हाँ, प्रमोद नै मार के आपनै बड्डिया नी करया ! मास्टर जी, उपन्यास सारै का सारा जमा एंडी है ! कितै लाइन तो दूर की बात अक्षर की बी गलती कोन्या ! मास्टर जी, मैं एक छोटा सा आदमी एक महान शख्सियत की रचना पढके गर्व मेंहसूश कर रया सूं। भगवान पै याए दुआ मांगूं अक लिक्खण म्है आप आए दिन और ऊँचे चढ़दे जाओ।
भोत मेहरबानी। एक बै फेर सारे भाण -भाइयां नै राम -राम।
( श्री मनजीत सिंह भ्याण मूलतः हिसार जिले के सरसौद गाँव से हैं। आप चंडीगढ़ ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग में बतौर कंडक्टर कार्यरत हैं। यह पहला हरियाणवी उपन्यास है जो मनजीत ने पढ़ा। इतनी थका देने वाली सख्त नौकरी के बावजूद इन्होने मेरे इस उपन्यास को न केवल पढ़ा बल्कि अपनी अमूल्य राय से मुझे अवगत भी कराया। तभी तो कहता हूँ कि मनजीत ने मेरा तो मन ही जीत लिया। )

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