सुनीता करोथवाल : ---सबतै पैहलम तो उपन्यासकार आदरणीय श्री प्रदीप नील जी नै भोत-भोत बधाई
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साची कहूँ तै आजकाल च्यारूं कानी ' जाट कहै सुण जाटणी ' की ए चर्चा सै बस । आर चर्चा होणी बी चाहिए , क्यूंक लिखण मैं लेखक नै कोये कसर ए नईं छोड्ड राक्खी । इस नॉवेल की सारयाँ तै बड्डी खासियत योये सै अक एके कहाणी म्है हरियाणे के आम जीवन तै लेके राजनीति तक,पढाई के सिस्टम तै लेकै मिलावट तक हर छोटी तै छोटी बुराई का लेखा-जोखा इतना कसूत दे राख्या सै अक एक पुराणी कहावत याद आग्गी "बात की बात, आर लात की लात ।"
हाम हरियाणे आल्यां खातर इसतै बड्डे मान की बात और के हो सकै सै अक ठेठ देसी बोली म्है लिख्या यो उपन्यास आपणी माट्टी की तो बात ए के , हरियाणा की सीम कै लाग्दे परदेसां म्है बी पोहंच लिया । उपन्यास के सारे पात्रां नै इतनी सुथरी ढाल एक कहाणी की माला म्है मोती से पिरोणा भोत ए मुस्कल काम रया होगा । आपणे समाज की सारी ए तो बुराई एके किताब म्है फिट करदी लिखणिये नै । म्हारे समाज म्है जगां जगां बणे गोलू देवता के मंदर ,किते धोती प्रसाद की मिलावट, किते हिंदी साहित्य पै कटाक्ष, राजनीति का भुण्डा खेल ,शिक्षा का व्यापार और सबतै बढ़िया आम जनता बी नईं छोड्डी । छोडनी बी नईं चइए , हाम बी दूध के धोए ना सां । जित बी नाचण गाण आळी दिक्खी, मजे लेण पहोंचे जावां सां । कौण के कह रया सै अक हामनै कोये मतलब नई ।
लेखक नै म्हारे घरां की सासू तै ले कै बजार म्है मर्दाना ताकत बाँड्ण आले झोला छाप डॉक्टरां तक नै लपेटै म्है ले लिया । आज कै जमाने म्है जिसनै देखो , ओए लेखक बणया हांडै सै। पर प्रदीप सर नै करारी चोट हरियाणवी में लिख कै जो समाज पै करी सै ,उसकी अणगिणत बधाई ए बधाई । प्रदीप सर आपनै तो झंडे गाड दिये ,देखो इब कोण माई का लाल इन नै उखाड़ै । बाकी हरियाणवी बोली मैं लिख कै जो आपने हरियाणवी बोली जो का मान बढाया सै, उस खातर हाथ जोड़कै आपनै प्रणाम ।
जय हो
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(भिवानी से सुनीता करोथवाल हिंदी की बहुत ही संवेदनशील और सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं। आप के कविता संग्रह हरियाणा साहित्य अकादमी में सहायता अनुदानार्थ विचाराधीन हैं। आपका अगला संग्रह कहानियों का आएगा। )
साची कहूँ तै आजकाल च्यारूं कानी ' जाट कहै सुण जाटणी ' की ए चर्चा सै बस । आर चर्चा होणी बी चाहिए , क्यूंक लिखण मैं लेखक नै कोये कसर ए नईं छोड्ड राक्खी । इस नॉवेल की सारयाँ तै बड्डी खासियत योये सै अक एके कहाणी म्है हरियाणे के आम जीवन तै लेके राजनीति तक,पढाई के सिस्टम तै लेकै मिलावट तक हर छोटी तै छोटी बुराई का लेखा-जोखा इतना कसूत दे राख्या सै अक एक पुराणी कहावत याद आग्गी "बात की बात, आर लात की लात ।"
हाम हरियाणे आल्यां खातर इसतै बड्डे मान की बात और के हो सकै सै अक ठेठ देसी बोली म्है लिख्या यो उपन्यास आपणी माट्टी की तो बात ए के , हरियाणा की सीम कै लाग्दे परदेसां म्है बी पोहंच लिया । उपन्यास के सारे पात्रां नै इतनी सुथरी ढाल एक कहाणी की माला म्है मोती से पिरोणा भोत ए मुस्कल काम रया होगा । आपणे समाज की सारी ए तो बुराई एके किताब म्है फिट करदी लिखणिये नै । म्हारे समाज म्है जगां जगां बणे गोलू देवता के मंदर ,किते धोती प्रसाद की मिलावट, किते हिंदी साहित्य पै कटाक्ष, राजनीति का भुण्डा खेल ,शिक्षा का व्यापार और सबतै बढ़िया आम जनता बी नईं छोड्डी । छोडनी बी नईं चइए , हाम बी दूध के धोए ना सां । जित बी नाचण गाण आळी दिक्खी, मजे लेण पहोंचे जावां सां । कौण के कह रया सै अक हामनै कोये मतलब नई ।
लेखक नै म्हारे घरां की सासू तै ले कै बजार म्है मर्दाना ताकत बाँड्ण आले झोला छाप डॉक्टरां तक नै लपेटै म्है ले लिया । आज कै जमाने म्है जिसनै देखो , ओए लेखक बणया हांडै सै। पर प्रदीप सर नै करारी चोट हरियाणवी में लिख कै जो समाज पै करी सै ,उसकी अणगिणत बधाई ए बधाई । प्रदीप सर आपनै तो झंडे गाड दिये ,देखो इब कोण माई का लाल इन नै उखाड़ै । बाकी हरियाणवी बोली मैं लिख कै जो आपने हरियाणवी बोली जो का मान बढाया सै, उस खातर हाथ जोड़कै आपनै प्रणाम ।
जय हो
(भिवानी से सुनीता करोथवाल हिंदी की बहुत ही संवेदनशील और सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं। आप के कविता संग्रह हरियाणा साहित्य अकादमी में सहायता अनुदानार्थ विचाराधीन हैं। आपका अगला संग्रह कहानियों का आएगा। )

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