सचिन बांगड़: ---- इतिहास गवाह है कि जिस भी बोलचाल के साधन यानि बोली और भाषा में साहित्य की रचना नहीं होती...वह या तो लुप्त हो जाया करती है , या फिर अपना मूल रूप खो बैठती है। सीधी सी बात है कि कान्वेंट स्कूलों की होड़ में बच्चा अंग्रेजी का ऑक्स कहना सीख जाता है , घर में हिंदी में बैल कहना भी सीख लेगा। मगर बलद बोला नहीं कि माँ-बाप की त्योरियां चढ़ी नहीं। ऐसे में दिक्कत यह है कि हिंदी-अंग्रेजी तो स्कूल सिखा देगा लेकिन अपनी बोली सिखाने वाला सिर्फ और सिर्फ एक ही स्कूल होता है , और वह अद्भुत स्कूल है माँ। और आजकल की मांएं ही हरियाणवी को गंवारू बोली कह कर परहेज करने लगी हैं। ऐसे में अपनी बोली जिन्दा रहे भी तो कैसे ?
. इसी मां बोली को जिन्दा रखने के लिए प्राणवायु के रूप में सामने आया है प्रदीप नील का ठेठ हरियाणवी बोली का नॉवेल ' जाट कहवै , सुण जाटणी '. हम हरियाणवियों को गर्व है 20 साल तक अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रदीप जी ने अपनी बोली को यह मान दिया। यह नॉवेल न केवल हमारी वर्तमान बल्कि भावी पीढ़ी को हमारी बोली और आसपास के वास्तविक माहौल से रूबरू कराता है। बेजोड़ कहानी के माध्यम से हमारी बोली की अनसुनी कहावतों , मुहावरों और परिवेश से परिचित होना है तो पढिए यह उपन्यास। हर हरियाणवी चाहे वह किसान हो , दुकानदार हो , स्कूल-कॉलेज का विद्यार्थी हो , मल्टी-नेशनल कम्पनी में हो या विदेश में ,यह हरियाणवी उपन्यास जरूर पढे...
अभी तो आम धारणा यही है कि हरियाणा में हरियाणवी में साहित्य नहीं रचा गया। मैं तो कहता हूँ कि आप सब लेखक का साथ देंगे तो हरियाणवी साहित्य न केवल अपने पांवों पर चलना बल्कि तरक्की के रास्ते दौड़ना भी शुरू कर देगा। .
प्रदीप नील जी की इस कोशिश को सलाम और बहुत बहुत बधाई....
हरियाणवी साहित्य के सिर की पगड़ी है यह उपन्यास मेरी नजरों में ..
लेखक ने उपन्यास के जरिए हमारी बोली में इतना कुछ समेट के रख दिया कि जो कोई भी भारत दर्शन करना चाहे ...बिना भारत आये भी कर सकता है। राजनीति ,धर्म ,जाति, बेरोजगारी,आम आदमी का प्रेम,गुस्सा,बेबसी,मौकापरस्ती कोई पहलू भी तो नहीं छोड़ा लेखक ने ,..228 पन्नों में ये सब रोचकता और व्यंग्यात्मक भाषा में लिखना वाकई एक करिश्मा है।
इसकी कहानी सिर्फ मेदनीपुर या हरियाणा की सीमा में सीमित नही रह सकती...ये विशुद्ध भारतीय सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था है
प्रमोद अम्बिका और वसुधा के अस्पताल वाले दृश्य ने और वसुधा और प्रमोद के हर दृश्य ने मुझे आपकी कलम का मुरीद बना दिया, प्रदीप जी।
जयंत और दुबे जी का चित्रण आपने ग़ज़ब का किया है
विलेन जरूर है लेकिन कई जगह बेचारे से भी लगे। धूर्त जयंत हर गाँव में बैठा है आज और हर पार्टी में दूबे जी है। कच्छाधारियों की कुरड़ी पे जब प्रमोद उगता है तो राजनैतिक और धार्मिक गधे उसे चर जाते है। उधर कम उम्र में विधवा हुई लाखों वसुधा अपने पुनः जीवन के अरमान लिए रोज घुट घुट के मरती है।
फैन तो मैं आपका पहले पन्ने पे ही हो गया था
खरीद के पढ़ने वाले पाठकों को समर्पित कर दी आपने पुस्तक। तेरा तुझको अर्पण वाली फील आ गई थी। हरियाणवी पुस्तक पाठकों को ही अर्पण कर दी ! कमाल !
प्रदीप नील जी, आपकी कलम से निकली हर एक पंक्ति लाजवाब है...भविष्य में भी आप इसी तरह माँ बोली की सेवा करते रहें।
आपकी आने वाली सभी रचनाओं के इंतज़ार में
सचिन बांगड़
. इसी मां बोली को जिन्दा रखने के लिए प्राणवायु के रूप में सामने आया है प्रदीप नील का ठेठ हरियाणवी बोली का नॉवेल ' जाट कहवै , सुण जाटणी '. हम हरियाणवियों को गर्व है 20 साल तक अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रदीप जी ने अपनी बोली को यह मान दिया। यह नॉवेल न केवल हमारी वर्तमान बल्कि भावी पीढ़ी को हमारी बोली और आसपास के वास्तविक माहौल से रूबरू कराता है। बेजोड़ कहानी के माध्यम से हमारी बोली की अनसुनी कहावतों , मुहावरों और परिवेश से परिचित होना है तो पढिए यह उपन्यास। हर हरियाणवी चाहे वह किसान हो , दुकानदार हो , स्कूल-कॉलेज का विद्यार्थी हो , मल्टी-नेशनल कम्पनी में हो या विदेश में ,यह हरियाणवी उपन्यास जरूर पढे...
अभी तो आम धारणा यही है कि हरियाणा में हरियाणवी में साहित्य नहीं रचा गया। मैं तो कहता हूँ कि आप सब लेखक का साथ देंगे तो हरियाणवी साहित्य न केवल अपने पांवों पर चलना बल्कि तरक्की के रास्ते दौड़ना भी शुरू कर देगा। .
प्रदीप नील जी की इस कोशिश को सलाम और बहुत बहुत बधाई....
हरियाणवी साहित्य के सिर की पगड़ी है यह उपन्यास मेरी नजरों में ..
लेखक ने उपन्यास के जरिए हमारी बोली में इतना कुछ समेट के रख दिया कि जो कोई भी भारत दर्शन करना चाहे ...बिना भारत आये भी कर सकता है। राजनीति ,धर्म ,जाति, बेरोजगारी,आम आदमी का प्रेम,गुस्सा,बेबसी,मौकापरस्ती कोई पहलू भी तो नहीं छोड़ा लेखक ने ,..228 पन्नों में ये सब रोचकता और व्यंग्यात्मक भाषा में लिखना वाकई एक करिश्मा है।
इसकी कहानी सिर्फ मेदनीपुर या हरियाणा की सीमा में सीमित नही रह सकती...ये विशुद्ध भारतीय सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था है
प्रमोद अम्बिका और वसुधा के अस्पताल वाले दृश्य ने और वसुधा और प्रमोद के हर दृश्य ने मुझे आपकी कलम का मुरीद बना दिया, प्रदीप जी।
जयंत और दुबे जी का चित्रण आपने ग़ज़ब का किया है
विलेन जरूर है लेकिन कई जगह बेचारे से भी लगे। धूर्त जयंत हर गाँव में बैठा है आज और हर पार्टी में दूबे जी है। कच्छाधारियों की कुरड़ी पे जब प्रमोद उगता है तो राजनैतिक और धार्मिक गधे उसे चर जाते है। उधर कम उम्र में विधवा हुई लाखों वसुधा अपने पुनः जीवन के अरमान लिए रोज घुट घुट के मरती है।
फैन तो मैं आपका पहले पन्ने पे ही हो गया था
खरीद के पढ़ने वाले पाठकों को समर्पित कर दी आपने पुस्तक। तेरा तुझको अर्पण वाली फील आ गई थी। हरियाणवी पुस्तक पाठकों को ही अर्पण कर दी ! कमाल !
प्रदीप नील जी, आपकी कलम से निकली हर एक पंक्ति लाजवाब है...भविष्य में भी आप इसी तरह माँ बोली की सेवा करते रहें।
आपकी आने वाली सभी रचनाओं के इंतज़ार में
सचिन बांगड़
( सचिन बांगड़ हिसार से हैं और फिलहाल चंडीगढ़ में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। आपकी हरियाणवी और हिंदी लेखन में बहुत रुचि है )

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