मंगलवार, 14 नवंबर 2017

'जाट कहवै, सुण जाटणी' पहला हरियाणवी उपन्यास है जो मैंने पढ़ा । यह मुझे बहुत ही पसन्द आया । इसमें दूबे जी और पुजारी जी का जो रोल है, वह आज की कड़वी सच्चाई है । ये लोग भोली भाली जनता का कितना फायदा उठाते हैं , उपन्यास में इसका बहुत बढिया चित्रण है ।
यह उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह हंसी भी बहुत आई । खास कर ,धोती प्रसाद की स्कूल में दी गई स्पीच ने खूब हंसाया । उसकी बेकार और निरर्थक कविताओं ने भी दिमाग खराब किया। उपन्यास ने सही दिखाया कि ऐसे नकली भी कवि होते हैं आजकल । दूसरी तरफ दूबे जी जैसे भ्रष्ट लोग आज भी भोली जनता का फायदा उठा रहे हैं.और बेचारे प्रमोद जैसे भोले लोग उनके षड्यंत्र में पता नही कहाँ गुम हो जाते हैं.. उपन्यास ने उदास भी बहुत किया प्रमोद के मरने पर। वह कम से कम शिशिर के लिए ब्यान दे जाता तो तस्वीर ही बदल जाती। मुझे वसुधा पर भी बहुत दया आई। उसका प्रेम सच्चा था प्रमोद के लिए... पर बेचारी गरीब विधवा को दुनिया से डर भी था.
सच कहूँ तो मुझे ये उपन्यास बहुत ही अच्छा लगा...मैं तो कहती हूँ आप सब भी इस हरियाणवी उपन्यास को एक बार जरूर पढ़े..क्योंकि इसमें समाज का सच्चा रूप दिखाया गया है और वो भी अपनी हरियाणवी भाषा में।
प्रदीप जी , आपने बहुत अच्छा प्रयास किया है.. उम्मीद है कि आप आगे भी जारी रखेंगे. हरियाणवी भाषा को ऎसे ही आगे ले जाते रहे
धन्यवाद..
( बबीता कन्यान करनाल के शामगढ़ से हैं और व्यवसाय से इंजीनियर हैं। )

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