मेरे बडे भाई प्रदीप नील वशिष्ठ जी का हरियाणवी उपन्यास मेरे हाथ मे है ।ढेरों उपन्यास अब तक पढे है ।एक से एक महान और सफल लेखकों के ।पर वशिष्ठ जी का उपन्यास "विशिष्ठ" है कुछ अलग है अद्भुत है कारण कि यह हरियाणवी भाषा मे है ।रामचरितमानस महाभारत गीता जैसी अमर और शाश्वत रचनाये और गोदान ,गुनाहो के देवता से लेकर चेतन भगत तक को पढने के बाद भी एक बात मन मे जरूर रहती थी, काश हरियाणवी मे कोई बढिया किताब होती मजा आ जाता ।हरियाणा जैसे छोटे से प्रान्त से भी बडे लेखक हुए है ।पर अपनी भाषा मे पढने का आनन्द अलग ही है ।प्रिय प्रदीप नील भाई आपने हमे ऐसा आन्न्द प्रदान किया है जिसको मै अपने ही तरीके से कहना चाहूगां यानि कैसा लग रहा है "जाट कहवै सुन जाटनी " तो ऐसा लग रहा है जैसे फाईव स्टार मे बैठ के मम्मी के हाथ की बनी वो लाल मिर्च की चटनी !!! बाकि की साहित्यिक समीक्षा तो उपन्यास के पढने के बाद करूगा ।यह खुशी तो सिर्फ हरियाणवी उपन्यास के हाथ मे आने भर की है जिसे मैने अपनो के साथ प्रकट करना व सांझा करना चाहा है ।

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