जाट कहवै , सुण जाटणी
पाठकों से सर्वाधिक प्यार-दुलार प्राप्त करने वाला हरियाणवी उपन्यास जिसे सभी श्रेणी के लोग चाव से पढ़ रहे हैं .
शनिवार, 26 मई 2018
शनिवार, 13 जनवरी 2018
हरियाणवी में उपन्यास - सच कहू तो मैंने पहले कभी सुना ही नहीं था... अभी भी कई हफ्तों से केवल अपने मित्रो की पोस्ट इस बारे में देख कर ही काम चला रहा था... इस रविवार जाना हैं प्रगति मैदान, बुक फेयर में... बडौत के लेखक Amit Rai Jain जी की योग पर आधारित पुस्तक का विमोचन होना हैं... तब इस उपन्यास को भी जरुर खरीदना हैं... आप लोगो को भी इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए... ये मैं अभी तक मिली प्रतिक्रियाओं के आधार पर कह रहा हूँ... अपना सही फीडबैक तो मित्र प्रदीप नील वशिष्ठ जी को उपन्यास पढने के बाद ही दे पाऊंगा...
अगली पोस्ट जैन साहब की बुक के बारे में...
--रवि शर्मा
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Apna Baraut
मेरे बडे भाई प्रदीप नील वशिष्ठ जी का हरियाणवी उपन्यास मेरे हाथ मे है ।ढेरों उपन्यास अब तक पढे है ।एक से एक महान और सफल लेखकों के ।पर वशिष्ठ जी का उपन्यास "विशिष्ठ" है कुछ अलग है अद्भुत है कारण कि यह हरियाणवी भाषा मे है ।रामचरितमानस महाभारत गीता जैसी अमर और शाश्वत रचनाये और गोदान ,गुनाहो के देवता से लेकर चेतन भगत तक को पढने के बाद भी एक बात मन मे जरूर रहती थी, काश हरियाणवी मे कोई बढिया किताब होती मजा आ जाता ।हरियाणा जैसे छोटे से प्रान्त से भी बडे लेखक हुए है ।पर अपनी भाषा मे पढने का आनन्द अलग ही है ।प्रिय प्रदीप नील भाई आपने हमे ऐसा आन्न्द प्रदान किया है जिसको मै अपने ही तरीके से कहना चाहूगां यानि कैसा लग रहा है "जाट कहवै सुन जाटनी " तो ऐसा लग रहा है जैसे फाईव स्टार मे बैठ के मम्मी के हाथ की बनी वो लाल मिर्च की चटनी !!! बाकि की साहित्यिक समीक्षा तो उपन्यास के पढने के बाद करूगा ।यह खुशी तो सिर्फ हरियाणवी उपन्यास के हाथ मे आने भर की है जिसे मैने अपनो के साथ प्रकट करना व सांझा करना चाहा है ।
#जाट #कहवै #सुन #जाटनी फेम प्रदीप नील वशिष्ठ
एक लेखक से knhi ज्यादा प्रेरणादायक व्यक्तित्व। साधुवाद सर बहुत ही सुखद अनुभव। उम्मीद से knhi अधिक जानकारी प्राप्त। विभिन्न विषयों पर चर्चा भी हुई।
सम्मानित सर की लिखी पुस्तक अभी पढ़ी नहीं है इस पर भी चर्चा जल्द ही।।
अंत में.....#If #you #falls #in #love #with #a #writer #u#can #never #die....(one of my favorite quote)
----https://www.facebook.com/parmodsharma087
एक लेखक से knhi ज्यादा प्रेरणादायक व्यक्तित्व। साधुवाद सर बहुत ही सुखद अनुभव। उम्मीद से knhi अधिक जानकारी प्राप्त। विभिन्न विषयों पर चर्चा भी हुई।
सम्मानित सर की लिखी पुस्तक अभी पढ़ी नहीं है इस पर भी चर्चा जल्द ही।।
अंत में.....#If #you #falls #in #love #with #a #writer #u#can #never #die....(one of my favorite quote)
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शनिवार, 30 दिसंबर 2017
(मीनाक्षी वर्मा ) :
संयोग देखिए कि जिंदगी का पहला उपन्यास पढ़ा भी तो अपनी बोली हरियाणवी का 'जाट कहवै, सुण जाटणी' । इस दौरान यूं लगता रहा जैसे उपन्यास नहीं पढ़ रही बल्कि कोई फ़िल्म आंखों के सामने चल रही हो। कमाल का सजीव चित्रण किया प्रदीप नील वशिष्ठ जी आपने ।
चार पीढ़ियों में फैली इस कहानी में कोई भी विषय नहीं छोड़ा लेखक ने । उपन्यास की खासियत यह कि सीधी सपाट कहानी नहीं है । इस उपन्यास की कई गलियां हैं और हर गली हमें अपने समाज की तरफ लेकर चलती है । रास्ते में कहीं व्यभिचार या कुरीतियों का घुटनों तक कीचड़ है तो कहीं नारी सौंदर्य के सुंदर फूल खिले हैं ।
हास्य रस तो कमाल का है ही, अपनी बोली के शब्दों का चयन भी बेजोड़ है । कहीं कहीं हंसते हंसते पेट दुखने लगता है ,वहीं प्रमोद वसुधा की प्रेम कहानी आंसू भी छलका देती है । प्रमोद का अंत तो मार्मिक है ही, उसके बुत के साथ जो दुर्व्यवहार होता है वह इसी निर्मम समाज की झलक है ।
उपन्यास की दो विशेषताएं और भी उल्लेखनीय हैं । एक तो यह कि पाठक में बढ़िया काव्य की समझ पैदा होती है और दूसरा धोती का चरित्र बताता है कि प्रेम सिर्फ देह से नहीं बल्कि आत्मा से जुड़ा होता है । सिर्फ सुंदर ही नहीं बल्कि बेडौल लोगों में भी प्रेम की वही भावनाएं होती हैं ।
उपन्यास में उपमाएं बहुत हैं मगर कहीं कहीं इतनी ज्यादा कि कहानी के प्रवाह में बाधा पड़ती है। लेकिन मैंने इस उपन्यास को मन लगाकर पढ़ा , सहज सहज । खत्म हो गया तो लगा काश अभी खत्म न होता। समय निकाल कर इसे फिर पढूंगी , बार- बार पढूंगी । अब तो मैं और उपन्यास भी पढ़ा करुँगी। इस उपन्यास की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी कि इसने मुझमें उपन्यास पढने की रूचि जगाई । आपको हार्दिक बधाई प्रदीप जी और अगले उपन्यास की शुभकामनाएँ
( हरियाणा की लता मंगेशकर के रूप में विख्यात बहुमुखी प्रतिभा की धनी मीनाक्षी पांचाल ने तेरह वर्ष की उम्र से गाना शुरू किया था . उसके बाद तो हिंदी हो या हरियाणवी , फ़िल्में , एल्बम हों या जिंगल मीनाक्षी जी की आवाज अपना जादू बिखेरती रही .भ्रूण हत्या पर ' मात मन्नै मरवाइए मत ना ' गीत से विशेष ख्याति पाने वाली मीनाक्षी जी टोहाना के वरिष्ठ संगीतकार Makk vee से शादी के बाद मीनाक्षी वर्मा के नाम से जानी जाती हैं . टीवी पर कभी हरियाणवी रामायण देखने का मौका मिले तो सीता की आवाज़ सुनेंगे तो पहचान जाएँगे कि यह आवाज़ तो मीनाक्षी की है . )
संयोग देखिए कि जिंदगी का पहला उपन्यास पढ़ा भी तो अपनी बोली हरियाणवी का 'जाट कहवै, सुण जाटणी' । इस दौरान यूं लगता रहा जैसे उपन्यास नहीं पढ़ रही बल्कि कोई फ़िल्म आंखों के सामने चल रही हो। कमाल का सजीव चित्रण किया प्रदीप नील वशिष्ठ जी आपने ।
चार पीढ़ियों में फैली इस कहानी में कोई भी विषय नहीं छोड़ा लेखक ने । उपन्यास की खासियत यह कि सीधी सपाट कहानी नहीं है । इस उपन्यास की कई गलियां हैं और हर गली हमें अपने समाज की तरफ लेकर चलती है । रास्ते में कहीं व्यभिचार या कुरीतियों का घुटनों तक कीचड़ है तो कहीं नारी सौंदर्य के सुंदर फूल खिले हैं ।
हास्य रस तो कमाल का है ही, अपनी बोली के शब्दों का चयन भी बेजोड़ है । कहीं कहीं हंसते हंसते पेट दुखने लगता है ,वहीं प्रमोद वसुधा की प्रेम कहानी आंसू भी छलका देती है । प्रमोद का अंत तो मार्मिक है ही, उसके बुत के साथ जो दुर्व्यवहार होता है वह इसी निर्मम समाज की झलक है ।
उपन्यास की दो विशेषताएं और भी उल्लेखनीय हैं । एक तो यह कि पाठक में बढ़िया काव्य की समझ पैदा होती है और दूसरा धोती का चरित्र बताता है कि प्रेम सिर्फ देह से नहीं बल्कि आत्मा से जुड़ा होता है । सिर्फ सुंदर ही नहीं बल्कि बेडौल लोगों में भी प्रेम की वही भावनाएं होती हैं ।
उपन्यास में उपमाएं बहुत हैं मगर कहीं कहीं इतनी ज्यादा कि कहानी के प्रवाह में बाधा पड़ती है। लेकिन मैंने इस उपन्यास को मन लगाकर पढ़ा , सहज सहज । खत्म हो गया तो लगा काश अभी खत्म न होता। समय निकाल कर इसे फिर पढूंगी , बार- बार पढूंगी । अब तो मैं और उपन्यास भी पढ़ा करुँगी। इस उपन्यास की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी कि इसने मुझमें उपन्यास पढने की रूचि जगाई । आपको हार्दिक बधाई प्रदीप जी और अगले उपन्यास की शुभकामनाएँ
( हरियाणा की लता मंगेशकर के रूप में विख्यात बहुमुखी प्रतिभा की धनी मीनाक्षी पांचाल ने तेरह वर्ष की उम्र से गाना शुरू किया था . उसके बाद तो हिंदी हो या हरियाणवी , फ़िल्में , एल्बम हों या जिंगल मीनाक्षी जी की आवाज अपना जादू बिखेरती रही .भ्रूण हत्या पर ' मात मन्नै मरवाइए मत ना ' गीत से विशेष ख्याति पाने वाली मीनाक्षी जी टोहाना के वरिष्ठ संगीतकार Makk vee से शादी के बाद मीनाक्षी वर्मा के नाम से जानी जाती हैं . टीवी पर कभी हरियाणवी रामायण देखने का मौका मिले तो सीता की आवाज़ सुनेंगे तो पहचान जाएँगे कि यह आवाज़ तो मीनाक्षी की है . )
रविवार, 10 दिसंबर 2017
बबीता कन्यान
'जाट कहवै, सुण जाटणी' पहला हरियाणवी उपन्यास है जो मैंने पढ़ा । यह मुझे बहुत ही पसन्द आया । इसमें दूबे जी और पुजारी जी का जो रोल है, वह आज की कड़वी सच्चाई है । ये लोग भोली भाली जनता का कितना फायदा उठाते हैं , उपन्यास में इसका बहुत बढिया चित्रण है ।
यह उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह हंसी भी बहुत आई । खास कर ,धोती प्रसाद की स्कूल में दी गई स्पीच ने खूब हंसाया । उसकी बेकार और निरर्थक कविताओं ने भी दिमाग खराब किया। उपन्यास ने सही दिखाया कि ऐसे नकली भी कवि होते हैं आजकल । दूसरी तरफ दूबे जी जैसे भ्रष्ट लोग आज भी भोली जनता का फायदा उठा रहे हैं.और बेचारे प्रमोद जैसे भोले लोग उनके षड्यंत्र में पता नही कहाँ गुम हो जाते हैं.. उपन्यास ने उदास भी बहुत किया प्रमोद के मरने पर। वह कम से कम शिशिर के लिए ब्यान दे जाता तो तस्वीर ही बदल जाती। मुझे वसुधा पर भी बहुत दया आई। उसका प्रेम सच्चा था प्रमोद के लिए... पर बेचारी गरीब विधवा को दुनिया से डर भी था.
सच कहूँ तो मुझे ये उपन्यास बहुत ही अच्छा लगा...मैं तो कहती हूँ आप सब भी इस हरियाणवी उपन्यास को एक बार जरूर पढ़े..क्योंकि इसमें समाज का सच्चा रूप दिखाया गया है और वो भी अपनी हरियाणवी भाषा में।
प्रदीप जी , आपने बहुत अच्छा प्रयास किया है.. उम्मीद है कि आप आगे भी जारी रखेंगे. हरियाणवी भाषा को ऎसे ही आगे ले जाते रहे
धन्यवाद..
यह उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह हंसी भी बहुत आई । खास कर ,धोती प्रसाद की स्कूल में दी गई स्पीच ने खूब हंसाया । उसकी बेकार और निरर्थक कविताओं ने भी दिमाग खराब किया। उपन्यास ने सही दिखाया कि ऐसे नकली भी कवि होते हैं आजकल । दूसरी तरफ दूबे जी जैसे भ्रष्ट लोग आज भी भोली जनता का फायदा उठा रहे हैं.और बेचारे प्रमोद जैसे भोले लोग उनके षड्यंत्र में पता नही कहाँ गुम हो जाते हैं.. उपन्यास ने उदास भी बहुत किया प्रमोद के मरने पर। वह कम से कम शिशिर के लिए ब्यान दे जाता तो तस्वीर ही बदल जाती। मुझे वसुधा पर भी बहुत दया आई। उसका प्रेम सच्चा था प्रमोद के लिए... पर बेचारी गरीब विधवा को दुनिया से डर भी था.
सच कहूँ तो मुझे ये उपन्यास बहुत ही अच्छा लगा...मैं तो कहती हूँ आप सब भी इस हरियाणवी उपन्यास को एक बार जरूर पढ़े..क्योंकि इसमें समाज का सच्चा रूप दिखाया गया है और वो भी अपनी हरियाणवी भाषा में।
प्रदीप जी , आपने बहुत अच्छा प्रयास किया है.. उम्मीद है कि आप आगे भी जारी रखेंगे. हरियाणवी भाषा को ऎसे ही आगे ले जाते रहे
धन्यवाद..
मंगलवार, 14 नवंबर 2017
मीनाक्षी चौधरी : किताबें पढ़ने का शौक तो माँ से विरासत में मिला मुझे । हिंदी, अंग्रेजी की असंख्य किताबें तो पढ़ी ही, अनुवाद की जगह मूल साहित्य पढ़ने के लिए पंजाबी भी सीखी मैंने । हरियाणवी कहानियां तो माँ की खूब पढ़ी ही थी । ऐसे में इस हरियाणवी उपन्यास की चर्चा सुनी तो इसे पढ़ने की उत्सुकता चरम पर पहुंच गई ।
जैसा नाम सुना था, वैसे यह उपन्यास है भी । सच कहूं तो मैंने इसके पात्रों को अपने आसपास जीवित होते देखा । कहानी सुनाती अपनी ही नानी दिखी, धोती प्रसाद से पड़ौस के काका और दूबे जैसा ही काइयां गाँव का दुकानदार । तब लगा उपन्यास का मेदनीपुर मेरा गांव है और देश का हर गाँव मेदनीपुर ।
कभी हंसाते-गुदगुदाते और कभी रुलाते पात्रों से हम इतना जुड़ जाते हैं कि कहानी प्रदीप जी की न रह कर हमारी अपनी सी हो जाती है ।
घोर अँधेरे में आशा की किरण बन कर आए प्रमोद से मिल कर लगता है ,अभी मेदनीपुर की सूरत बदल जाएगी । लेकिन वह शातिर दूबे की घिनौनी चाल का शिकार बन जाता है तो दिल बहुत उदास हो जाता है । उसकी और वसुधा की निश्छल सी प्रेम कहानी का अंत देख भी मन धुआं धुआं होने लगता है ।
लेकिन यह बॉलीवुड की कहानी तो है नहीं कि कोई चमत्कार हो और हैप्पी एंडिंग हो जाए। महाभारत काल के शकुनि के पांसे जब तक दूबे जैसे नेताओं के हाथ हैं, प्रमोद यूं ही हारते रहेंगे । उपन्यास के इसी वास्तविक चित्रण ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया । अन्याय, शोषण और षड्यंत्र का अंतहीन सिलसिला जब तक चलेगा, कहानी भी निरन्तर चलेगी ।
बधाई और शुभ कामनाएं प्रदीप जी ।
( दिल्ली पब्लिक स्कूल बठिंडा में जीव विज्ञान पढ़ाने वाली मीनाक्षी चौधरी प्रबुद्ध पाठक हैं । आप कुरुक्षेत्र निवासी हरियाणवी की सुप्रसिद्ध रचनाकार श्रीमती कमलेश चौधरी की बेटी हैं । साहित्य की जन्म घुट्टी बचपन से ही मिली , इसलिए आपका मन साहित्य में ही रमता है ।)
जैसा नाम सुना था, वैसे यह उपन्यास है भी । सच कहूं तो मैंने इसके पात्रों को अपने आसपास जीवित होते देखा । कहानी सुनाती अपनी ही नानी दिखी, धोती प्रसाद से पड़ौस के काका और दूबे जैसा ही काइयां गाँव का दुकानदार । तब लगा उपन्यास का मेदनीपुर मेरा गांव है और देश का हर गाँव मेदनीपुर ।
कभी हंसाते-गुदगुदाते और कभी रुलाते पात्रों से हम इतना जुड़ जाते हैं कि कहानी प्रदीप जी की न रह कर हमारी अपनी सी हो जाती है ।
घोर अँधेरे में आशा की किरण बन कर आए प्रमोद से मिल कर लगता है ,अभी मेदनीपुर की सूरत बदल जाएगी । लेकिन वह शातिर दूबे की घिनौनी चाल का शिकार बन जाता है तो दिल बहुत उदास हो जाता है । उसकी और वसुधा की निश्छल सी प्रेम कहानी का अंत देख भी मन धुआं धुआं होने लगता है ।
लेकिन यह बॉलीवुड की कहानी तो है नहीं कि कोई चमत्कार हो और हैप्पी एंडिंग हो जाए। महाभारत काल के शकुनि के पांसे जब तक दूबे जैसे नेताओं के हाथ हैं, प्रमोद यूं ही हारते रहेंगे । उपन्यास के इसी वास्तविक चित्रण ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया । अन्याय, शोषण और षड्यंत्र का अंतहीन सिलसिला जब तक चलेगा, कहानी भी निरन्तर चलेगी ।
बधाई और शुभ कामनाएं प्रदीप जी ।
( दिल्ली पब्लिक स्कूल बठिंडा में जीव विज्ञान पढ़ाने वाली मीनाक्षी चौधरी प्रबुद्ध पाठक हैं । आप कुरुक्षेत्र निवासी हरियाणवी की सुप्रसिद्ध रचनाकार श्रीमती कमलेश चौधरी की बेटी हैं । साहित्य की जन्म घुट्टी बचपन से ही मिली , इसलिए आपका मन साहित्य में ही रमता है ।)
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