शनिवार, 30 दिसंबर 2017

(मीनाक्षी वर्मा ) : 
 संयोग देखिए कि जिंदगी का पहला उपन्यास पढ़ा भी तो अपनी बोली हरियाणवी का 'जाट कहवै, सुण जाटणी' । इस दौरान यूं लगता रहा जैसे उपन्यास नहीं पढ़ रही बल्कि कोई फ़िल्म आंखों के सामने चल रही हो। कमाल का सजीव चित्रण किया प्रदीप नील वशिष्ठ जी आपने । 
चार पीढ़ियों में फैली इस कहानी में कोई भी विषय नहीं छोड़ा लेखक ने । उपन्यास की खासियत यह कि सीधी सपाट कहानी नहीं है । इस उपन्यास की कई गलियां हैं और हर गली हमें अपने समाज की तरफ लेकर चलती है । रास्ते में कहीं व्यभिचार या कुरीतियों का घुटनों तक कीचड़ है तो कहीं नारी सौंदर्य के सुंदर फूल खिले हैं ।
हास्य रस तो कमाल का है ही, अपनी बोली के शब्दों का चयन भी बेजोड़ है । कहीं कहीं हंसते हंसते पेट दुखने लगता है ,वहीं प्रमोद वसुधा की प्रेम कहानी आंसू भी छलका देती है । प्रमोद का अंत तो मार्मिक है ही, उसके बुत के साथ जो दुर्व्यवहार होता है वह इसी निर्मम समाज की झलक है ।
उपन्यास की दो विशेषताएं और भी उल्लेखनीय हैं । एक तो यह कि पाठक में बढ़िया काव्य की समझ पैदा होती है और दूसरा धोती का चरित्र बताता है कि प्रेम सिर्फ देह से नहीं बल्कि आत्मा से जुड़ा होता है । सिर्फ सुंदर ही नहीं बल्कि बेडौल लोगों में भी प्रेम की वही भावनाएं होती हैं ।
उपन्यास में उपमाएं बहुत हैं मगर कहीं कहीं इतनी ज्यादा कि कहानी के प्रवाह में बाधा पड़ती है। लेकिन मैंने इस उपन्यास को मन लगाकर पढ़ा , सहज सहज । खत्म हो गया तो लगा काश अभी खत्म न होता। समय निकाल कर इसे फिर पढूंगी , बार- बार पढूंगी । अब तो मैं और उपन्यास भी पढ़ा करुँगी। इस उपन्यास की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी कि इसने मुझमें उपन्यास पढने की रूचि जगाई । आपको हार्दिक बधाई प्रदीप जी और अगले उपन्यास की शुभकामनाएँ
( हरियाणा की लता मंगेशकर के रूप में विख्यात बहुमुखी प्रतिभा की धनी मीनाक्षी पांचाल ने तेरह वर्ष की उम्र से गाना शुरू किया था . उसके बाद तो हिंदी हो या हरियाणवी , फ़िल्में , एल्बम हों या जिंगल मीनाक्षी जी की आवाज अपना जादू बिखेरती रही .भ्रूण हत्या पर ' मात मन्नै मरवाइए मत ना ' गीत से विशेष ख्याति पाने वाली मीनाक्षी जी टोहाना के वरिष्ठ संगीतकार Makk vee से शादी के बाद मीनाक्षी वर्मा के नाम से जानी जाती हैं . टीवी पर कभी हरियाणवी रामायण देखने का मौका मिले तो सीता की आवाज़ सुनेंगे तो पहचान जाएँगे कि यह आवाज़ तो मीनाक्षी की है . )

रविवार, 10 दिसंबर 2017

बबीता कन्यान


'जाट कहवै, सुण जाटणी' पहला हरियाणवी उपन्यास है जो मैंने पढ़ा । यह मुझे बहुत ही पसन्द आया । इसमें दूबे जी और पुजारी जी का जो रोल है, वह आज की कड़वी सच्चाई है । ये लोग भोली भाली जनता का कितना फायदा उठाते हैं , उपन्यास में इसका बहुत बढिया चित्रण है ।
यह उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह हंसी भी बहुत आई । खास कर ,धोती प्रसाद की स्कूल में दी गई स्पीच ने खूब हंसाया । उसकी बेकार और निरर्थक कविताओं ने भी दिमाग खराब किया। उपन्यास ने सही दिखाया कि ऐसे नकली भी कवि होते हैं आजकल । दूसरी तरफ दूबे जी जैसे भ्रष्ट लोग आज भी भोली जनता का फायदा उठा रहे हैं.और बेचारे प्रमोद जैसे भोले लोग उनके षड्यंत्र में पता नही कहाँ गुम हो जाते हैं.. उपन्यास ने उदास भी बहुत किया प्रमोद के मरने पर। वह कम से कम शिशिर के लिए ब्यान दे जाता तो तस्वीर ही बदल जाती। मुझे वसुधा पर भी बहुत दया आई। उसका प्रेम सच्चा था प्रमोद के लिए... पर बेचारी गरीब विधवा को दुनिया से डर भी था.
सच कहूँ तो मुझे ये उपन्यास बहुत ही अच्छा लगा...मैं तो कहती हूँ आप सब भी इस हरियाणवी उपन्यास को एक बार जरूर पढ़े..क्योंकि इसमें समाज का सच्चा रूप दिखाया गया है और वो भी अपनी हरियाणवी भाषा में।
प्रदीप जी , आपने बहुत अच्छा प्रयास किया है.. उम्मीद है कि आप आगे भी जारी रखेंगे. हरियाणवी भाषा को ऎसे ही आगे ले जाते रहे
धन्यवाद..
( बबीता कन्यान करनाल के शामगढ़ से हैं और व्यवसाय से इंजीनियर हैं। )